मल्टीटास्किंग
by प्रवीण पाण्डेय
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एक समय में कितना कुछ |
ईश्वर ने आपको ५ कर्मेन्द्रियाँ व ५ ज्ञानेन्द्रियाँ देकर मल्टीटास्किंग का आधार तो दे ही दिया है। पर यह तो उत्पाद के निर्माता से ही पूछना पड़ेगा कि दसों इन्द्रियों को एक साथ उपयोग में लाना है या अलग अलग समय में। एक समय में एक कर्मेन्द्रिय और एक ज्ञानेन्द्रिय तो कार्य कर सकती हैं पर दो कर्मेन्द्रिय या दो ज्ञानेन्द्रिय को सम्हालना कठिन हो जाता है। दस इन्द्रियों के साथ एक ही मन और एक ही बुद्धि प्रदान कर ईश्वर ने अपना मन्तव्य स्पष्ट कर दिया है।
खाना बनाते हुये गुनगनाना, रेडियो सुनते हुये पढ़ना आदि मल्टीटास्किंग के प्राथमिक उदाहरण हैं और बहुलता में पाये जाते हैं। जटिलता जैसे जैसे बढ़ती जाती है, मल्टीटास्किंग उतनी ही विरल होती जाती है। मोबाइल कम्पनियों को संभवतः पता ही न हो और वे हमारे लिये मल्टीटास्किंग के और सूक्ष्म तन्त्र बनाने में व्यस्त हों।
आप में से बहुत लोग यह कह सकते हैं कि मल्टीटास्किंग तो संभव ही नहीं है, समय व्यर्थ करने का उपक्रम। एक समय में तो एक ही काम होता है, ध्यान बटेगा तो कार्य की गुणवत्ता प्रभावित होगी या दुर्घटना घटेगी। एक समय में एक ही विषय पर ध्यान दिया जा सकता है। मैं तो आपकी बात से सहमत हो भी जाऊँ पर उन युवाओं को आप कैसे समझायेंगे जो एक ही समय में ही सब कुछ कर डालना चाहते हैं, ऊर्जा की अधिकता और अधैर्य में उतराते युवाओं को। जेन के अनुयायी इसे एक समय में कई केन्द्र बिन्दुओं पर मन को एकाग्र करने जैसा मानते हैं, जिसके निष्कर्ष आपको भटका देने वाले होते हैं। हमारे बच्चे जब भी भोजन करते समय टीवी देखते हैं, दस मिनट का कार्य आधे घंटे में होता है, पता नहीं क्या अधिक चबाया जाता है, भोजन या कार्टून।
थोड़ी गहनता से विचार किया जाये तो, मल्टीटास्किंग का गुण अभ्यास से ही आता है। अभ्यास जब इतना हो जाये कि वह कार्य स्वतः ही होने लगे, बिना आपके ध्यान दिये हुये, तब आप उस कार्य को मल्टीटास्किंग के एक अवयव के रूप में ले सकते हैं। धीरे धीरे यह कलाकारी बढ़ती जाती है और आप एक समय में कई कार्य सम्हालने के योग्य हो जाते हैं, आपकी उत्पादकता बढ़ जाती है और सामने वाले का आश्चर्य।
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वाह रे वाह, इतना कुछ |
क्या हमारे पास सच में समय की इतनी कमी है कि हमें मल्टीटास्किंग की आवश्यकता पड़े? क्या मल्टीटास्किंग में सच में समय बचता है? औरों के बारे में तो नहीं कह सकता पर मेरे पास इतना समय है कि एक समय में दो कार्य करने की आवश्यकता न पड़े। एक समय में एक कार्य, वह भी पूरे मनोयोग से, उसके बाद अगला कार्य। वहीं दूसरी ओर एक समय में एक कार्य को पूर्ण एकाग्रता से करने में हर बार समय बचता ही है। इस समय लैपटॉप पर लिख रहा हूँ तो वाई-फाई बन्द है, शेष प्रोग्राम बन्द हैं, एक समय में बस एक कार्य। मेरे लिये कम्प्यूटरीय या मोबाइलीय सहस्रबाहु किसी काम का नहीं।
आजकल कार्यालय आते समय एक तेलगू फिल्म का पोस्टर देखता हूँ, बड़ी भीड़ भी रहती है वहाँ, कोई बड़ा हीरो है। आप चित्र देख लें, मल्टीटास्किंग का बेजोड़ उदाहरण है यह, बदमाश की गर्दन पर पैर, खोपड़ी पर पिस्तौल तनी, मोबाइल से कहीं बातचीत और बीच सड़क पर ‘विनाशाय च दुष्कृताम्’ का मंचन।
क्या आप भी हैं मल्टीटास्किंग के हीरो?
चित्र साभार – http://youoffendmeyouoffendmyfamily.com/
'एक समय में एक कार्य, वह भी पूरे मनोयोग से, उसके बाद अगला कार्य।' वास्तव में सफलता की युक्ति भी यही है…!अंत में आपने पोस्टर से multitasking को खूब connect किया है:)
ये गुण हर किसी के वश की बात नहीं होती है, अब रही बात आपकी आखिरी वाली, उसके बारे में इतना ही कि शायद ही कोई हो जो एक साथ दो या तीन कार्य ना कर पाता हो।
हीरो-ज़ीरो तो पता नहीं, पर ड्राइव करते समय खबरें सुन लेते हैं, नहाते समय गाने। खाते समय टीवी पर अपने पसन्दीदा कार्यक्रम देखते हैं और ब्लॉग पोस्ट व टिप्पणियाँ लिखते समय कहानियाँ व प्रवचन सुन लेते हैं। पढाई, लिखाई का काम हवाई यात्राओं के भरोसे रहता है।
जाने अनजाने "मल्टीटास्किंग" होती ही रहती है| जैसे ड्राइविंग करते समय न चाहते हुए भी दिमाग पता नहीं कहाँ कहाँ सोचता रहता है|
मल्टीकास्टिंग की बात आपने सही कही | लेकिन ज्यादातर लोग इसे अपना रहे हैं | तकनीक कर दौर है तो खुद को तकनीक के साथ चलना ये इस पीढ़ी की मन:स्थिति बनती जा रही है | इसका कुछ कारण अभिभावक ही हैं जो शुरू से बच्चों की इस मानसिकता की तरफ ध्यान नहीं देते | आज के अभिभावक इस प्रकार की मन:स्थिति को खुद ही पैदा करते हैं | जैसे अपने बच्चे को यदि दूध पिलाना है तो उसे कार्टून नेटवर्क या ऐसे ही किसी अन्य चैनल लगा कर दिया जाता है और उसे कहते हैं कि बेटा टी.वी. देखते हुए दूध पी लो, खाना खा लो | ये आज भी हो रहा है व इससे पहले भी होता आया है व शायद आगे भी होता रहेगा | ऐसी छोटी -छोटी बाते ही बच्चों में एक ही समय में दो कामों को करने की मानसिकता पैदा करते हैं | यही मानसिकता यौवन अवस्था में और बढ़ जाती है |
कृपया माडरेशन का विकल्प हटा दें |
उम्दा व्यंग्य के साथ उम्दा जानकारी |
अच्छी विचारधारा है पर आप समाज को इस तरफ यानी मल्टीटास्किग की ओर जाने से रोक नही सक्ते ये आज की मजबूरी या जरुरत मे से कुछ भी हो सक्ता है शेष आलेख बहुत सटीक है
एक समय में एक कार्य, वह भी पूरे मनोयोग से, उसके बाद अगला कार्य। वहीं दूसरी ओर एक समय में एक कार्य को पूर्ण एकाग्रता से करने में हर बार समय बचता ही है। सार्थक बात है …ध्यान केन्द्रित हो तो ही दक्षता हासिल होती है ….
मल्टीस्टाकिंग को लेकर बहुत ही उपयोगी आलेख पढ़वाने के लिए धन्यवाद!आपकी कलम की धारा यूँ ही बहती रहे!शुभकामनाओं सहित-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
mahilayen to hamesha se karti aai hain …
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
गृहिणियों के नजरिये से बताऊँ तो हमारा काम तो मल्टी टास्किंग के बिना चलता ही नहीं !अखबार पढ़ते हुए चाय पीना , टीवी देखना और बच्चों की शरारतों पर नजर रखते हुए उन्हें टोकते हुए किचन में बन रही सब्जी का ध्यान भी रखना, कई बार पूछते हैं बच्चे, आपकी कितनी आँखें हैं !
सटीक व्यंग, बेहतर जानकारी के साथ। बहुत सुंदर
मल्टीटास्किंग अच्छा गुण है. लेकिन इसका होना कोई विशेष उपलब्धि नहीं है. कई महँ विभूतियों के बारे में पता चलता है की उनमें यह गुण था, लेकिन उनसे भी अधिक संख्या उन लोगों की है जो एक वक़्त में एक ही काम को तरजीह देते रहे और अपने कार्यों में अग्रणी रहे. कुल मिलाकर, यह हो तो अच्छा, न हो तो भी कोई कमी नहीं.व्यक्ति में जितनी चाह रहेगी वह उतना ही अधिक करने को उद्यत और उतावला बना रहेगा. फिर उसे इसकी ज़रुरत पड़ेगी. जाने-अनजाने वाली मल्टीटास्किंग तो मष्तिष्क स्वतः करता रहता है जैसे गाड़ी चलाते समय बातें करना और संगीत सुनना आदि. यह मल्टीटास्किंग नहीं है. क्योंकि इसमें टास्क सिर्फ एक ही है, और वह है गाड़ी चलाना, बाकी बातें हों या न हों, उनसे कोई फर्क नहीं पड़ता. हांलांकि कुछ लोगों को गाड़ी चलाते समय बातें करना या संगीत सुनना भी व्यवधान लगता है लेकिन ज्यादातर लोग इसे सहज ही कर लेते हैं.
इसे पढ़कर अपनी ही कविता याद आ गई। लगा कि आपने कविता की संपूर्ण व्याख्या कर दी। पढ़ा है आपने। लिंक यह रहा..http://devendra-bechainaatma.blogspot.com/2011/09/blog-post_11.html…मेरे विचारों से मेल खाती बढ़िया पोस्ट। एक समय में एक काम ही करना श्रेयस्कर है।
एक विचित्र तरह का प्रयोग करता हूँ मैं.. कई बार सफल भी रहता हूं…. सोते समय… किसी विज्ञापन का ब्रीफ पढ़ लेता हूँ और दिमाग के किसी कोने में रख कर सो जाता हूं… सुबह मेरे लिए विज्ञापन की रूप रेखा तैयार मिलती है…
साइकल चलाते हुए गुनगुनाना ,नहाते हुए गाना,अखबार पढते हुए चाय पीना,भैस चराते हुए क्रिकेट-कमेंट्री सुनना (भले ही वह दूसरे के खेत में घुस जाए ,और टीपते हुए संगीत सुनना यदि मल्टी-टास्किंग है तो बुरा नहीं है.आज बिना इस टूल के कुछ होता भी नहीं,का कहत हैं,"एक पंथ,बहु काज " !
एक समय में एक कार्य, वह भी पूरे मनोयोग से, उसके बाद अगला कार्य। वहीं दूसरी ओर एक समय में एक कार्य को पूर्ण एकाग्रता से करने में हर बार समय बचता ही है। बिल्कुल …..पोस्टर का उदहारण तो गज़ब का है …..
क्लाइंट से बात करते हुए हो रही बातों को टाईप करना, अपने टीम के लोगों को उन बातों को समझाते जाना भी जिन्हें अमेरिकन एक्सेंट समझने में दिक्कत है, और अपने इंटरनल मैसेजिंग सर्विस पर बॉस से भी बाते करते जाना..इतना तो करना ही पड़ता है.. 😦
हुम्म…मुझमें यह गुण जन्मजात है. देवगौड़ा की तरह. झपकी ले रहा हूँ, और साथ में टिपिया भी रहा हूं…:)
सिक्के के दोनों पहलू हैं
मल्टीटास्किंग के बिना गुज़ारा ही नहीं होता …एक ही समय पर कई काम ना निपटाए जाए तो ना तो घर संभलता है और ना ऑफिस …वैसे नारी को ईश्वर ने ये गुण देकर ही भेजा है … 🙂 पुरुष जरूर इसमें थोड़े कच्चे रह जाते है
दिल्ली पुलिस मल्टीटास्किंग के विरूद्ध है… किसी को भी ड्राइविंग करते समय मोबाईल पर बात नहीं करने देती.
वाह …बहुत ही बढि़या ।
समय की मांग के अनुरूप ढलते हुए मानव जीवन, समय की बलिहारी है
मल्टीटास्किंग आजकल डिमांड में है इसके चक्कर में लोग जोमान (JOAMON—jack of all master of none.) क्लब के सदस्य हो गए गए है.
वास्तव देखा जाये तो प्रति समय ही हम मल्टी टास्किंग करते रहते है ! देखते हुए सुनते रहना ………… आदि….आदि…. जिस प्रकार कोए की आँख दो होती है पर पुतली सिर्फ एक होती है पर वह पुतली को इतनी तेज घुमाता है की सामान्य देखने पर हमें पता ही नहीं पड़ता है दो आँखों के बीच में एक पुतली के द्वारा वह दोनों और देख रहा है ! ठीक उसी प्रकार हम सभी इन्द्रियों का प्रयोग करते है हमें लगता है की हमने एक साथ एक से अधिक इन्द्रिय का उपयोग किया परन्तु वास्तव में मन जो की एक है बारी- बारी से प्रत्येक इन्द्रिय के साथ जुड़ कर जानता है परन्तु हमें पता नहीं लगता …….. एक समय में एक इन्द्रिय के विषय को ही हम जान सकते है परन्तु मन की जानने की गति इतनी तेज़ है की हमें महसूस नहीं होता है हम एक समय में एक ही काम कर सकते है ….
मल्टीटास्किंग का असली रूप तो नारी में आदिकाल से विद्यमान हैयकीं ना हो तो देवियों के प्रतीक चित्र देखे जा सकते हैं।
एकै साधे सब सधे सब साधे सब जाय जैक आफ आल तो ठीक किंतु मास्टर इन वन ही अच्छा
नारियाँ मल्टीटास्किंग की बेहतरीन उदाहरण हैं ..पर तकनीकि काम एक साथ नहीं हो सकते .. वैसे तो खाना बनाना भी तकनीकि में आता है 🙂 पर इसकी आदत हो गयी है ..हमारे बच्चे जब भी भोजन करते समय टीवी देखते हैं, दस मिनट का कार्य आधे घंटे में होता है, पता नहीं क्या अधिक चबाया जाता है, भोजन या कार्टून।यह बात सही कही है ..जो काम कम समय में होना था उसके लिए आधा घंटा लगा ..बच्चों को पता होता है जब तक खाना खायेंगे तब तक कार्टून देखने से कोई नहीं रोकेगा ..इस लिए समय लगाते हैं ..विचारणीय लेख
जो काम आदत में शुमार हो गये हैं वे तो multitasking में हो जाते हैं बाकी में तो वही सुनहरा नियम -One thing at atime.
तभी तो हमारे पूर्वजों ने इसे काली का रूप दे दियाथा और आज हम उस प्रतीक को अवतरित होते देक रहे हैं 🙂
हमारे देवी-देवता भी तो इसके प्रतीक हैं। कुछ हाथों में हथियार, कुछ में फूल साथ ही वाहन की सवारी भी और राक्षस की हत्या करते हुए भी। जैसे काम बहुत हो और वक्त भागा जा रहा हो।
एक ही समय में अनेक काम करने का हुनर बहुकर्म को आपने बेहद सरल तरीके से समझाया है .मनोवैज्ञानिक व्याख्या भी प्रस्तुत की है अलबत्ता बच्चों का ,आबाल्वृद्धों का टी वी देखते हुए भोजन करना उन्हें भोजन के रस रूप से वंचित रखता है .सतरंगी सलाद का अपना एंजाइम विज्ञान होता है देखते ही एंजाइम बनतें हैं पाचन शुरु हो जाता है ग्रास मुख में रखने से पहले ही .
कभी कभी ऐसा करना पड़ सकता है..जब वक्त की कमी हो पर हमेशा ऐसा करना मुश्किलों को बढा सकता है.सुंदर व सार्थक लेख !
गाँधी जी, लिंकन जैसे महान लोगों के विषय में लिखा होता है कि वे मल्टीटास्किंग थे . या उनमें मल्टी टेलेंट था कि बहुत काम को एक साथ निपटाया करते थे.सच्चाई क्या है पता नहीं.
multitasking to ab jindagi ka hissa ban gaya hai…..aapke examples bahut acche lage…
उपयोगी जानकारी देता हुआ लेख ।सुन्दर प्रस्तुति !लोकतंत्र के चौथे खम्बे पर अपने विचारों से अवगत कराएँऔचित्यहीन होती मीडिया और दिशाहीन होती पत्रकारिता
कहा जाता है कि मर्दों के मुकाबले औरतें मल्टी टास्किंग में ज्यादा निपुण होती हैं.(कृपया इसे किसी नारीवादी विचारधारा से प्रेरित कमेन्ट न समझा जाये :))…क्योंकि मैं भी एक वक्त में एक ही काम ठीक से कर पाती हूँ.बढ़िया आलेख.
हम तो एक समय में एक काम के मूल मंत्र को ही मानते हैं।
जरूरत मल्टीटासकिंग की नहीं सायं रखने की है। बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति आभार ……
मैं तो बहुकार्यन को बहुत बढ़ावा देता हूँ पर हाँ बहुत मेहनत के बाद ही इसमें कदम रखे चाहिए नहीं तो जो सारे काम बहुकार्यन में कर रहे हैं, सब बिगड़ जाएँगे..कुछ-कुछ स्थिति में तो बहुकार्यन के बिना काम ही नहीं चलता है..
आपका निष्कर्ष एकदम सही है है – 'एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।'
विचारणीय आलेख्।
aaj kal ke zamane main toh har kissi ko multitasking karna aana he chcheye
मल्टीटास्किंग हम भी करते हैं।टी वी देखते समय ब्रेक का समय नष्ट नहीं होता।सब्जी काटकर, अखबार पढकर या अपने आईपैड पर ब्लॉग पढकर समय का सद् उपयोग करते हैं।किसी भी भारतीय गृहिणी से पूछिए ।रसोई घर में मल्टीटास्किंग करना उनके लिए आम बात है।कुछ लोगों के लिए मल्टीटास्किंग एक मजबूरी है।हाँ, पर स्कूटर या मोटर साईकल चलाते समय मोबाईल फोन पर बात करना कुछ लोगों की एक बुरी और खतरनाक आदत बन गई है।जी विश्वनाथ
मल्टीटास्किंगजी, मशीन तो बाद में मल्टीटास्किंग हुई, इंसान तो पहले से ऐसा ही है…एक नए सिरे से सोचने का मोका दिया… साधुवाद.
पोस्टर मस्त है 🙂
bhaiprvin ji main aap ka kin shbdon me aabhar vykt kroon shbd nhi mil rhe hain aap ka sneh meri rchna ko sda mil rha hai kripya mera aabhr swuikar kr ke anugrhit kren aap sundr likh rhe hain aur samajik dayitv ka sflta poorvk nirvhn kr rhe hain aap ke lekhn me sjgta hai shubhkamnayen dr.vedvyathit@gmail.com09868842688
नव दुर्गा और नव शिवा जो करादें सो कम दो आँखें बारह हाथ यही है बहु -कामकाज .,मल्टी -टास्किंग .
अच्छा है।मुझे तो 'महेश बाबू' का ये 'दूकुड़ू' वाला पोस्टर बहुत पसंद आया।फिल्म भी 🙂
हमारी तो मजबूरी है "मल्टीटास्किंग", न करें तो सारे काम अधूरे रह जायें, यहाँ तक कि घर पर भी जब लेपटॉप पर बैठे होते हैं तो आधा ध्यान मोबाईल पर रहता है। मल्टीटास्किंग आज के युग में बहुत जरूरी हो गया है।
अब तो सरकारी कर्मचारी भी मल्टिटास्किंग डेजिगनेशन से नवाज़े गए हैं, पर अफ़सोस छठे वेतन आयोग ने ग्रुप ‘डि’ को तो मल्टिटास्किंग वाला बना दिया … लेकिन बाक़ी सब अभी भी सिंगल टास्किंग ही रह गए।
four wheelar driving bina multitasking gun ke nahi ho sakti isliye aaj ke bhautikwad me is gun ka hona jaruri bhi hai.vicharneey post.
four wheelar driving bina multitasking gun ke nahi ho sakti isliye aaj ke bhautikwad me is gun ka hona jaruri bhi hai.vicharneey post.
टू व्हीलर चलाते हुये मोबाईल पर बात करना न अपने लिये सुरक्षित है न ही सामने से आने वाले निर्दोष के लिये.'एक समय में एक कार्य, वह भी पूरे मनोयोग से, उसके बाद अगला कार्य।'सुखी जीवन के लिये यही सिद्धांत काम आता है.
प्रवीण जी !इन दिनों जीरो फैट की वकालत कोई नहीं कर्ता .मख्खन सफ़ेद वाला (लोनी ,कृष्ण कन्हैया वाली )मोडरेशन में खाई जा सकती है .चिकनाई में एकल संतृप्त ,बहु -संतृप्त तथा संतृप्त वसाओं का अंश रहना ही चाहिए .मोडरेशन इज दी की विद रेस्पेक्ट टू मोनोअन -सेच्युरेतिद ,पोलीअन -सेच्युरेतिद एंड सेच्युरेतिद फैट्स .
कभी कभी मल्टीटास्किंग करना अच्छा लगता है .. जैसे खाना खाते हुवे टी वी देखना या गाने सुनना .. वैसे ये हर हर किसियो के बस की बात नहीं की हर बात पे मल्टीटास्किंग कर सके …
दस मिनट का कार्य आधे घंटे में होता है, पता नहीं क्या अधिक चबाया जाता है, भोजन या कार्टून।HAHAHAHA…Achcha aalekh…..
…अपना तो मानना है कि कुदरत ने इंसान को बनाया ही मल्टीटास्किंग के लिये है… तभी तो महज एक साल की मेरी बिटिया एक ही वक्त में मेरी नाक में उंगली, मेरे कपड़ों को गीला, बोतल से दूध पीना, नये नये शब्द बनाकर गाना, लैपटॉप को छेड़ना, मेरे गुस्से पर नजर रखना, टीवी के एड देखना और और न जाने कितनी और हरकतें कर सकती है… :)…
सटीक व्यंग के साथ एक अच्छी जानकारी…
बहुत बढ़िया लगा! बेहतरीन प्रस्तुती!
आपकी पोस्ट बेहद पसंद आई! आपको शुभकामनाएं! " मुद्दों पर आधारित स्वस्थ बहस के लिए हमारे ब्लॉग http://tv100news4u.blogspot.com/ पर आपका स्वागत है!
इसी पोस्ट पर टिप्पणी पोस्ट करते हुए मेरा अकाउंट चला गया था और ब्लॉग गायब हो गए थे…डरते डरते फिर आया हूँ मगर वह टिप्पणी कहाँ ला पाया …कुछ याद कर के ये -नर की तुलना में नारी मालती टास्किंग में ज्यादा निपुण है -वह उन गुफा दिनों में जब नारों का झुण्ड शिकार पर होता था घर के सारे काम काज बच्चों का लालन पालन,सिल बट्टा और चौका बासन सब करती रहती थी -वह इसलिए वैकासिक रूप से एक मल्टी टास्कर है -पुरुष नहीं क्योकि उसे केवल और केवल शिकार पर फोकस होना होता था ..आज मल्टी टास्कर कई नौजवान दुर्घटनाओं में मर रहे हैं -एक तो मेरे सामने ही मोबाईल पर बात करते भीषण दुर्घटना का शिकार हुआ और आन स्पाट चल बसा …..आपकी पोस्ट ख़ास तौर पर पुरुषों के लिए चेतावनी है !
समय मिले तो मेरे एक नए ब्लाग "रोजनामचा" को देखें। कोशिश है कि रोज की एक बड़ी खबर जो कहीं अछूती रह जाती है, उससे आपको अवगत कराया जा सके।http://dailyreportsonline.blogspot.com
main to 1 saamay mein 1 hi kaam mein yakin karti hun.
एक ही समय में गाडी चलाना ,दो दो फोन काल्स लेना ज़रूरी अनुदेश दोनों पर अलग अलग देना लक्ष्यों का पीछा करने में मददगार ज़रूर है लेकिन क्लास -ए व्यक्तित्व के अपने देय देनदारी चुकानी पड़ती है ज़नाब .
अरे कल ही मैने भी इस पर लिखा….आपका लिखा अब देखा…एक ही विषय एक ही समय में…गजब टेलीपैथी है…..
@उड़न तश्तरी,टेलीपैथी या मात्र अद्भुत संयोग?
bhai mujhe to har kaam me multitasking karni padti hai….chaahe jo bhi kaam karun.. parallely biwi ko khus karna hi padta hai 😉
hehe a fun read.. well I am a multi-tasker 😀 I don't see anything bad in this, till it doesn't hamper the quality of work being done !!
आपने बड़ी सहजता से एक बार फिर गंभीर विषय उठाया है.नाम कोई भी दिया जाये, टुकड़ों में बंटा चित्त न तो शांति की अनुभूति कर सकता है न ही आनंद की खोज.एक शेर याद आ रहा है- इतने हिस्सों में बाँट चुका हूँ मैं कि मेरे हिस्सें में कुछ बचा ही नहीं.