ब्राउज़र

by प्रवीण पाण्डेय

ब्राउज़र का प्रयोग आप सब करते हैं, यही एक सम्पर्क सूत्र है इण्टरनेट से जुड़ने का और ब्लॉग आदि पढ़ने का। कई प्रचलित ब्राउज़र हैं, क्रोम, फायरफॉक्स, सफारी, इण्टरनेट एक्सप्लोरर आदि। सबके अपने सुविधाजनक बिन्दु हैं, पुरानी जान पहचान है, विशेष क्षमतायें हैं। इसके पहले कि उनके गुणों की चर्चा करूँ, तथ्य जान लेते हैं कि किसका कितना भाग है?

लगभग २ अरब इण्टरनेट उपयोगकर्ता हैं, ९४% डेक्सटॉप(या लैपटॉप) पर, ६% टैबलेट(या मोबाइल) पर। डेक्सटॉप पर ९२% अधिकार विण्डो का व शेष मैक का है। टैबलेट पर ६२% अधिकार एप्पल का व शेष एनड्रायड आदि का है। टैबलेट में ब्राउज़र का हिसाब सीधा है, जिसका टैबलेट या मोबाइल, उसका ही ब्राउज़र, बस ओपेरा को मोबाइल धारकों के द्वारा अधिक उपयोग में लाया जाता है। डेक्सटॉप पर ब्राउज़र का हिस्सा बटा हुआ है, मुख्यतः चार के बीच, क्रोम, फायरफॉक्स, सफारी और इण्टरनेट एक्सप्लोरर के बीच।

कौन कितने पानी में

२००४ तक ब्राउज़र पर लगभग इण्टरनेट एक्सप्लोरर का एकाधिकार था। २००४ से लेकर २००८ तक फायरफॉक्स ने वह हिस्सा आधा आधा कर दिया। २००८ में गूगल ने क्रोम उतारा और २०११ तक इन तीनों का हिस्सा लगभग एक तिहाई हो गया है। मैक ओएस में मुख्यतः सफारी और थोड़ा बहुत क्रोम भी प्रचलित है। जहाँ प्रतिस्पर्धा से सबसे अधिक लाभ उपयोगकर्ता को हुआ है, वहीं ब्राउज़र उतारने वालों के लिये यह इण्टरनेट के माध्यम से बढ़ते व्यापार पर प्रभुत्व स्थापित करने का उपक्रम है। पिछले दो वर्षों में जितना कार्य ब्राउज़र को उत्कृष्ट बनाने में हुआ है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। सबने ही एक के बाद एक ताबड़तोड़ संस्करण निकाले हैं, अपने अपने ब्राउज़रों के।

कौन सा ब्राउज़र उपयोग में लाना है, इसके लिये कोई स्थिर मानक नहीं हैं। जिसको जो सुविधाजनक लगता है, उस पर ही कार्य करता है, धीरे धीरे अभ्यस्त हो जाता है और अन्ततः उसी में रम जाता है। या कहें कि सबका स्तर एक सा ही है अतः किसी को भी उपयोग में ले आयें, अन्तर नहीं पड़ता है। फिर भी तीन मानक कहे जा सकते हैं, गति, सरलता व सुविधा, पर उन पक्षों के साथ कुछ हानि भी जुड़ी हैं। यदि गति अधिक होगी तो वह अधिक बैटरी खायेगा, सुविधा अधिक होगी तो अघिक रैम लगेगी और खुलने में देर भी लगेगी, सरल अधिक होगा तो हर सुविधा स्वयं ही जुटानी पड़ेगी।

जिस दिन से क्रोम प्रारम्भ हुआ है, उसी दिन से उस पर टिके हैं, कारण उसका सरल लेआउट, खोज और पता टाइप करने के लिये एक ही विण्डो, बुकमार्क का किसी अन्य मशीन में स्वयं ही पहुँच जाना, उपयोगी एक्सटेंशन और साथ ही साथ उसका अधिकतम तेज होना है। क्रोम के कैनरी संस्करण का भी उपयोग किया जिसमें आने वाले संस्करणों के बारे में प्रयोग भी चलते रहते हैं। मात्र दो अवसरों पर क्रोम से दुखी हो जाता था, पहला अधिक टैब होने पर उसका क्रैश कर जाना और दूसरा किसी भी वेब साइट को सीधे वननोट में भेजने की सुविधा न होना। बीच बीच में इण्टरनेट एक्सप्लोरर का नये संस्करण व फॉयरफाक्स पर कार्य किया पर दोनों ही उपयोग में बड़े भारी लगे। कुछ दिन घूम फिर कर अन्ततः क्रोम पर आना पड़ा।

जहाँ विण्डो में क्रोम का कोई विकल्प नहीं, मैक में परिस्थितियाँ भिन्न हैं। सफारी का प्रदर्शन जहाँ विण्डो में चौथे स्थान पर रहता है, मैक में उसे अपने घर में होने का एक बड़ा लाभ रहता है। मैक ओएस के अनुसार सफारी की संरचना की गयी है। क्रोम और सफारी दोनों में ही काम किया, बैटरी की उपलब्धता लगभग एक घंटे अधिक रहती है सफारी में। थोड़ा अध्ययन करने पर पता लगा कि कारण मुख्यतः ३ हैं। पहला तो क्रोम में प्रत्येक टैब एक अलग प्रोसेस की तरह चलता, यदि आपके १० टैब खुले हैं तो ११ प्रोसेस, एक अतिरिक्त क्रोम के लिये स्वयं, और हर प्रोसेस ऊर्जा खाता है। सफारी में कितने ही टैब खुले हों, केवल २ प्रोसेस ही चलते हैं, यद्यपि दूसरे प्रोसेस में रैम अधिक लगती है पर बैटरी बची रहती है। दूसरा कारण मैक ओएस के सुदृढ़ पक्ष के कारण है, मैक में यदि कोई प्रोसेस उपयोग में नहीं आता है तो वह तुरन्त सुप्तावस्था में चला जाता है। सफारी के उपयोग में न आ रहे टैब अवसर पाते ही सो जाते हैं, पर क्रोम की संरचना सुप्तावस्था में जाने के लिये नहीं बनी होने के कारण वह जगता रहता है और ऊर्जा पीता रहता है।

तीसरा कारण ग्राफिक्स व फ्लैश से सम्बन्धित है। एप्पल फ्लैश को छोड़ एचटीएमएल५ आधारित वीडियो लाने का प्रबल पक्षधर है, एप्पल का कहना है कि फ्लैश बहुत अधिक ऊर्जा खाता है और इस कारण से अन्य प्रक्रियाओं को अस्थिर कर देता है। एडोब व एप्पल का इस तथ्य को लेकर बौद्धिक युद्ध छिड़ा हुआ है। एचटीएमएल५ फ्लैश की तुलना में बहुत कम ऊर्जा खाता है। क्रोम में फ्लैश पहले से ही विद्यमान है और मैक में फ्लैश सपोर्ट न होने पर भी निर्बाध चलता है। सफारी में फ्लैश नहीं है, पर एक एक्सटेंशन के माध्यम से सारी फ्लैश वीडियो एचटीएमएल५ में परिवर्तित होकर आ जाते हैं, वह भी तब जब आदेश होते हैं। क्रोम प्रारम्भ करते ही उसकी जीपीयू(ग्राफिक्स प्रोसेसर यूनिट) स्वतः चल जाती हो, फ्लैश चले तो बहुत अधिक और न भी चले तब भी कुछ न कुछ ऊर्जा खाती रहती है।

मैक में अब हम वापस सफारी में आ गये हैं, क्रोम जितना ही तेज है, सरल भी है, पठनीय संदेश को बिना कोलाहल दिखाता है, कहीं अधिक स्थायी है और अथाह ऊर्जा बचाता है। क्यों न हो, देश की ऊर्जा जो बचानी है।

@ विवेक रस्तोगी जी – विण्डो में IE9 सबसे कम ऊर्जा खाता है पर सबसे तेज अभी भी क्रोम है। सफारी का प्रदर्शन मैक में ही सर्वोत्तम है।


संदर्भ-http://www.netmarketshare.com/ 

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