तरणताल में ध्यानस्थ

by प्रवीण पाण्डेय

तैरनाएक स्वस्थ और समुचित व्यायाम है, शरीरके सभी अंगों के लिये। यदि विकल्प हो और समय कम हो तो नियमित आधे घंटे तैरना हीपर्याप्त है शरीर के लिये। पानी में खेलना एक स्वस्थ और पूर्ण मनोरंजन है, मेरे बच्चे कहीं भी जलराशि या तरणताल देखते हैंतो छप छप करने के लिये तैयार हो जाते हैं, घंटों खेलते हैं पर उन्हें पता ही नहीं चलता है, अगले दिन भले ही नाक बहाते उठें। सूरज की गर्मी और दिनभर की थकान मिटानेके लिये एक स्वस्थ साधन है, तरणतालमें नहाना। गर्मियों में एक प्रतीक्षा रहती है, शाम आने की, तरणताल मेंसारी ऊष्मा मिटा देने की। कोई भी कारण हो, तैरना आये न आये, आकर्षणबना रहता है, तरणताल, झील, नदी या ताल के प्रति।
उपर्युक्तकारणों के अतिरिक्त, एक और कारण हैमेरे लिये। पानी के अन्दर उतरते ही अस्तित्व में एक अजब सा परिवर्तन आने लगता है, एक अजब सी ध्यानस्थ अवस्था आने लगती है। माध्यमका प्रभाव मनःस्थिति पर पड़ता हो या हो सकता है कि पिछले जन्मों में किसी जलचर काजीवन बिताया हो मैंने। मुझे पानी में उतराना भाता है, बहुत लम्बे समय के लिये, बिनाअधिक प्रयास किये हुये निष्क्रिय पड़े रहने का मन करता है। मन्थर गति सेब्रेस्टस्ट्रोक करने से बिना अधिक ऊर्जा गँवाये बहुत अधिक समय के लिये पानी मेंरहा जा सकता है। लगभग दस मिनट के बाद शरीर और साँसें संयत होने लगते हैं, एक लय आने लगती है, उसके बाद घंटे भर और किया जा सकता है यह अभ्यास।
क्या चल रहा है आपके मन में
प्रारम्भिकदिनों में एक व्यग्रता रहती थी तैरने में, कि किस तरह जलराशि पार की जाये। तब न व्यायाम हो पाता था, न ही मनोरंजन, होती थी तो मात्र थकान। तब एक बड़े अनुभवी और दार्शनिक प्रशिक्षक ने यहतथ्य बताया कि जलराशि शीघ्रतम पार कर लेने से तैरना नहीं सीखा जा सकता है, तैरना चाहते हो तो पानी में लम्बे समय के लियेरहना सीखो, पानी से प्रेम करो, पानी के साथ तदात्म्य स्थापित करो। शारीरिकसामर्थ्य(स्टैमना) बढ़ाने और पानी के अन्दर साँसों में स्थिरतालाने के लिये प्रारम्भ किया गया यह अभ्यास धीरे धीरे ध्यान की ऐसी अवस्था में लेजाने लगा जिसमें अपने अस्तित्व के बारे में नयी गहराई सामने आने लगी। इस विधि मेंशरीर हर समय पानी के अन्दर ही रहता है, बस न्यूनतम प्रयास से केवल सर दोतीन पल के लिये बाहर आता है, वह भी साँस भर लेने के लिये। पानी के माध्यम मेंलगभग पूरा समय रहने से जो विशेष अनुभव होता है उसका वर्णन कर पाना कठिन है, तन और मन में जलमय तरलता और शीतलता अधिकार करलेती है। पता नहीं इसे क्या नाम दें, जलयोग ही कह सकते हैं।
कभी कभीइस अवस्था को जीवन में ढूढ़ने का प्रयास करता हूँ। समय बिताना हो या समय में रमनाहो, समय बिताने की व्यग्रता हो यासमय में रम जाने का आनन्द, जीवनभारसम बिता दिया जाये या एक एक पल से तदात्म्य स्थापित हो,जीवन से सम्बन्ध सतही हो या गहराई में उतर कर देखा जाये इसकारंग? यदि व्यग्रता से जीने काप्रयास करेंगे तो वैसी ही थकान होगी जैसे कि तैरते समय पूरे शरीर को पानी के बाहररखने के प्रयास में होती है। साँस लेने के लिये पूरे शरीर को नहीं, केवल सर को बाहर निकालने की आवश्यकता है। जिसप्रकार डूबने का भय हमें ढंग से तैरने नहीं देता है, उसी प्रकार मरने का भय हमें ढंग से जीने नहीं देता है।
तैरने काआनन्द उठाना है तो ढंग से तैरना सीखना होगा। जीवन का आनन्द उठाना है तो ढंग सेजीना सीखना होगा।
चित्र साभार – http://www.flickriver.com/
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