डैडी दा पैसा, पुतरा मौज कर ले

by प्रवीण पाण्डेय

स्पष्टरूप से याद है, आईआईटी के प्रारंभिकदिन थे, रैगिंग अपने उफान पर थी, दिन भर बड़ी उलझन रहती थी और सायं होते होते मनमें ये विचार घुमड़ने लगते थे कि आज पता नहीं क्या होगा?
दिन भरकक्षाओं में प्रोफेसरों की भारी भारी बातें, नये रंगरूटों को अपने बौद्धिक उत्कर्ष से भेदती उनकी विद्वता, चार वर्षों में आपके भीतर के सामान्यव्यक्तित्व को आइन्स्टीन में बदल देने की उनकी उत्कण्ठा, श्रेष्ठता की उन पुकारों में सीना फुलाने का प्रयास करती आपकी आशंका और उसपर हम जैसे न जाने कितनों के लिये अंग्रेजी में दिये व्याख्यानों को न पचा पाने कीगरिष्ठता। ऐसी शैक्षणिक जलवायु में दिन बिताने का भारीपन मन में बड़ी गहरी थकानलेकर आता था।
हम तोसात वर्षों के छात्रावास के अनुभव के साथ वहाँ पहुँचे थे पर कईयों के लिये किसीनये स्थान पर अपरिचितों से पहला संपर्क उस भारीपन को और जड़ कर रहा था। यह भी ज्ञातथा कि रात्रि के भोजन के बाद ही रैगिंग के महासत्र प्रारम्भ होते हैं। कई मित्र इनसबसे बचने के लिये 5 किमी दूर स्थितगुरुदेव टाकीज़ में रात्रि का शो देखने निकल जाते थे और वह भी पैदल, न जाने की जल्दी और न ही आने की, बस किसी तरह वह समय निकल जाये। कुछ मित्रस्टेडियम में जाकर रात भर के लिये सो जाते थे, नील गगन और वर्षाकाल के उमड़े बादलों के तले।
तुलसीबाबा के हुइहे वही जो राम रचिराखाके उपदेश को मन में बसाकर हम तो अपने कमरे में जाकर सो जाते थे। जब रात में जगाई और रगड़ाई होनी ही है तोकमाण्डो की तरह कहीं भी और कभी भी सोने की आदत डाल लेनी चाहिये। जैसी संभावना थी, रात्रि के द्वितीय प्रहर में सशक्त न्योता आजाता है, आप भी पिंक फ्लॉयड के एनादर ब्रिक इन द वालकी तरह अनुभव करते हुये उस परिचयप्रवृत्त समाज का अंग बन जाते हैं।
रैगिंगपर विषयगत चर्चा न कर बस इतना कहना है कि उस समय औरों के कष्ट के सामने अपने कष्टबौने लगने लगते हैं और विरोध न कर चुपचाप अनुशासित बने रहने में आपको रैगिंग करनेवालों से भी अधिक आनन्द आने लगता है। परम्पराओं ने हर क्षेत्र में संस्कृति कोकितना कुछ दिया है, इसकी पुष्टिघंटों चला धाराप्रवाह अथक कार्यक्रम कर गया।
पुतरा, मौज कर ले

उस पूरेसमय में मेरा ध्यान एक सीनियर पर ही था, एक सरदार जी थे, आनन्दपानमें पूर्ण डूबे, वातावरण को अपनेजीवन्त व्यक्तित्व से सतत ऊर्जस्वित करते हुये, उनकी भावगंगा के प्रवाहमें संगीत का सुर मिल रहा था, पीछेएक पंजाबी गाना बज रहा था।

डैडी दापैसा पुतरा मौज कर ले, तेरा जमानापुतरा मौज कर ले…..
उनकेपास तो प्रोफेसरों के द्वारा सताये दिन को भुलाने का बहाना था, गले के नीचे उतारने को सोम रस था, उड़ाने के लिये डैडी दा पैसा था, आनन्दउत्सव में सर झुकाये सामने खड़े जूनियरों का समूह था, मित्रों का जमावड़ा था,युवावस्था की ऊर्जा थी। उनकी मौज के सारे कारक उपस्थित थे।
हमारेपास तो कुछ भी नहीं था, पर उस दिन विपरीत परिस्थितियों में भी हमें उन सरदार जी से अधिक आनन्द आया होगा क्योंकिहमें तो उनकी मौज पर भी मौज आ रही थी। अब यदि डैडी के पास उड़ाने वाला पैसा नहीं हैतो क्या मौज नहीं कर सकते?

चित्र साभार – http://noraggingfoundation.blogspot.com/

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