मैं अस्तित्व तम का मिटाने चला था

by प्रवीण पाण्डेय

मिला थामुझे एक सुन्दर सबेरा,

मैंतजकर तिमिरयुक्त सोती निशा को,
प्रथमजागरण को बुलाने चला था,
मैं अस्तित्वतम का मिटाने चला था ।।
विचारोंने जगकर अँगड़ाइयाँ लीं,
सूरज कीकिरणों ने पलकें बिछा दीं,
मैंबढ़ने की आशा संजोये समेटे,
विरोधों केकोहरे हटाने चला था ।
मैं अस्तित्वतम का मिटाने चला था ।।१।।
अजब सीउनींदी अनुकूलता थी,
तिमिरमें भी जीवित अन्तरव्यथा थी,
निराशाके विस्तृत महल छोड़कर,
मैं आशा कीकुटिया बनाने चला था ।
मैं अस्तित्वतम का मिटाने चला था ।।२।।
प्रतीक्षितफुहारें बरसती थीं रुक रुक,
पंछी थेफिर से चहकने को उत्सुक,
तपितग्रीष्म में शुष्क रिक्तिक हृदय को,
मैं वर्षा केरंग से भिगाने चला था ।
मैं अस्तित्वतम का मिटाने चला था ।।३।।
कहीं मनउमंगें मुदित बढ़ रही थीं,
कहींभाववीणा स्वयं बज रही थीं,
भुलाकरपुरानी कहीं सुप्त धुन को,
नया राग मैंगुनगुनाने चला था ।
मैं अस्तित्वतम का मिटाने चला था ।।४।।
 मैं अस्तित्व तम का मिटाने चला था

चित्र साभार – http://www.indiamike.com/
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