साहित्य और संग्रहण

by प्रवीण पाण्डेय

संग्रहणमनुष्य का प्राचीनतम व्यसन है। जब कभी भी कोई अतिरिक्त वस्त्र, भोजन, शस्त्र इत्यादि अस्तित्व में आया होगा, उसका संग्रहण किस प्रकार किया जाये, यह प्रश्न अवश्य उठा होगा। हर वस्तु के संग्रह करने की अलग विधि, अलग स्थान, अलग सुरक्षा, अलग समय सीमा।मूलभूत संग्रहण को पूरा करने के पश्चात आवश्यकताओं का क्रम और बढ़ा, ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य, सौन्दर्यबोध आदि विषय पनपे, उनसे सम्बन्धित संग्रहण भी आकार लेने लगा। मशीनें आयीं, कारखाने आये, व्यवसाय आया, संग्रहण काविज्ञान धीरे धीरे विकसित होने लगा। आज संग्रहण पर विशेषज्ञता, किसी भी व्यवसाय का अभिन्न अंग बन चुकी है।
हरव्यक्ति संग्रह करता है, आवश्यक भीहै, कोई अत्याधिक करता है, कोई न्यूनतम रखता है। पशुओं में भी संग्रहण कागुण दिखता है, जीवन में अनिश्चितताका भय इस संग्रह का प्रमुख कारण है। हम अपने घरों की सीमाओं में न जाने कितनीप्रकार की वस्तुओं को रखते हैं, हरएक का नियत स्थान और नियत आकार। मूलभूत आवश्यकताओं के ही लिये यदि घरों का निर्माणहोता तो सारा विश्व अपने दसवें भाग में सिमट गया होता।
नयेविश्व में नित नयी नयी वस्तुयें जन्म ले रही हैं, सबका अपना अलग संग्रहण प्रारूप। आलेखों, श्रव्य और दृश्य सामग्रियों को डिजिटल स्वरूप दिया जा रहा है, भौतिक विश्व धीरे धीरे आभासी में बदलता जा रहाहै अब चित्रों में भौतिक रंग नहीं वरन 1 और 0 से निर्मित आभासीरंगों का मिश्रण पड़ा होता है। भौतिक पुस्तकें और डायरी अब इतिहास के विषय होने कोअग्रसर हैं, उनका स्थान ले रहे हैंउनके डिजिटल अवतार। पुस्तकालय या तो आपके कम्प्यूटर पर सिमट रहे हैं या इण्टरनेटके किसी सर्वर पर धूनी रमाये बैठे हैं।
आप लेखलिखते हैं, कहानियाँ रचते हैं, कवितायें करते हैं, गीत गुनते हैं, चित्र गढ़तेहैं। संवाद के माध्यम डिजिटल होने के कारण, उन सृजनाओं का डिजिटल स्वरूप आवश्यक हो जाता है। बहुधा कम्प्यूटर के हीकिसी भाग में आपके सृजितशब्द पड़ेरहते हैं, फाइलों के रूप में। हम नवउत्साहियों के पास ऐसी सैकड़ों फाइलें होंगी औरजो वर्षों से सृजनकर्म में रत हैं, उनके लिये यह संख्या निश्चय ही हजारों मेंहोगी। न जाने कितनी फाइलें ऐसी होंगी जिसमें कोई एक विचार बाट जोहता होगा कि कब वहरचना की सम्पूर्णता पायेगा। सृजित और सृजनशील, पठित और पठनशील, न जानेकितनी रचनायें, कई विधायें, कई विषय, कई प्रकल्प, कई संदर्भ, यह सब मिलकर साहित्य संग्रहण के कार्य कोगुरुतर अवश्य बना देते होंगे।
साहित्यकारही नहीं, शोधकर्ता, विद्यार्थी, वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी औरइस श्रेणी में स्थित सबको ही ज्ञान के संग्रहण की आवश्यकता पड़ती है। संग्रहण केसिद्धान्त भौतिक जगत में जिस तरह से प्रयुक्त होते हैं, लगभग वैसे ही डिजिटल क्षेत्र में भी उपयोग में आते हैं। कम स्थान मेंसमुचित रखरखाव, समय पड़ने पर उनकीखोज, खोज में लगा समय न्यूनतम, शब्दों और विषयों के आधार पर खोज, अनावश्यक का निष्कासन,आवश्यक की गतिशीलता।

अब एक फोल्डर में इतनी, न जाने कितने फोल्डर
कम्प्यूटरमें कोई फाइल कहाँ है यह पता लगाना सरल है यदि आपने बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से उनकासंग्रहण किया है। आपको उस फाइल का नाम थोड़ा भी ज्ञात है तब भी कम्प्यूटर आपको खोजकर दे देगा आपकी रचना। किन्तु यदि आपको बस इतना याद पड़े कि उस रचना में कोई शब्दविशेष उपयोग किया है, तो असंभव साहो जायेगा खोज करना। कम्प्यूटर तब एक नगर जैसा हो जाता है और आपकी खोज में एक रचनाकिसी घर जैसी हो जाती है।
देखियेन, गूगल महाराज खोज के व्यवसाय सेही कितने प्रभावशाली हो गये हैं, इण्टरनेटीयज्ञान में गोता लगाने में इनकी महारत आपको इण्टरनेट में तो सहायता दे सकती है परआपके अपने कम्प्यूटर में वे कितना सहायक हो पायेंगे, इस विषय में संशय है। वैसे भी यदि ज्ञान इण्टरनेट पर न हो या ठीक सेक्रमबद्ध न हो तो उस विषय में गूगल भी गुगला जाते हैं। एक विषय पर लाखों निष्कर्षदे आपका धैर्य परखते हैं और पार्श्व में मुस्कराते हैं।
आपकेकम्प्यूटर पर साहित्यिक संग्रह आपका है, उपयोग आपको करना है, व्यवस्थित आपको करनाहै। आप करते हैं या नहीं? यदि करतेहैं तो कैसे? अपनी विधि से आपको भीअवगत करायेंगे, पर आपकी विधि जानने के बाद।
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