बिजली फूँकते चलो, ज्ञान बाटते चलो

by प्रवीण पाण्डेय

सूर्यपृथ्वी के ऊर्जाचक्र का स्रोत है, हमारी गतिशीलता का मूल कहीं न कहीं सूर्य सेप्राप्त ऊष्मा में ही छिपा है, इसतथ्य से परिचित पूर्वज अपने पोषण का श्रेय सूर्य को देते हुये उसे देवतातुल्यमानते थे, संस्कृतियों कीश्रंखलायें इसका प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।
पूर्वजोंने सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को बड़े ही सरल और प्राकृतिक ढंग से उपयोग किया, गोबर के उपलों व सूखी लकड़ी से ईंधन, जलप्रवाह से पनचक्कियाँ, पशुओं पर आधारित जीवन यापन, कृषि और यातायात। अन्य कार्यों में शारीरिकश्रम, पुष्ट भोजन और प्राकृतिक जीवनशैली।
संभवतःमानव को ऊर्जा को भिन्न भिन्न रूपों में उपयोग में लाना स्वीकार नहीं था। जिसप्रकार आर्थिक प्रवाह में वस्तुविनिमयकी सरल प्रक्रिया से निकल कई तरह की मुद्राओं चलन प्रारम्भ हो गया, लगभग हर वस्तु और सेवा का मूल्य निश्चित हो गया, उसी प्रकार प्राकृतिक जीवन शैली के हर क्रियाकलाप को बिजली पर आधारित कर दिया गया, हर कार्य के लिये यन्त्र और उसे चलाने के लिये बिजली।
बिजलीबनने लगी, बाँधों से, कोयले से, बन के तारों से बहने लगी, बिकनेभी लगी, मूल्य भी निश्चित हो गया।जिसकी कभी उपस्थिति नहीं थी मानव सभ्यता में, उसकी कमी होने लगी। संसाधनो का और दोहन होने लगा,धरती गरमाने लगी, हर कार्य में प्रयुक्त ऊर्जा की कार्बन मात्रा निकाली जाने लगी। पर्यावरणजागरण के नगाड़े बजने लगे।
जागरूकनागरिकों पर जागरण की नादों का प्रभाव अधिक पड़ता है, हम भी प्रभावित व्यक्तियों के समूह में जुड़ गये। बचपन में कुछ भी नव्यर्थ करने के संस्कार मिले थे पर बिजली के विषय में संवेदनशीलता सदा ही अपनेअधिकतम बिन्दु पर मँडराने लगती है। घर में बहुधा बिजली के स्विच बन्द करने काकार्य हम ही करते रहते हैं। डेस्कटॉप के सारे कार्य लैपटॉप पर, लैपटॉप के बहुत कार्य मोबाइल पर, थोड़ी थोड़ी बचत करते करते लगने लगा कि कार्बनके पहाड़ संचित कर लिये।

ऊर्जाका मूल फिर भी सूर्य ही रहा। अपने नये कार्यालय में एक बड़ी सी खिड़की पाकर उसमूलस्रोत के प्रति आकर्षण जाग उठा। स्थान में थोड़ा बदलाव किया, अपने बैठने के स्थान को खिड़की के पास ले जानेपर पाया कि खिड़की से आने वाला प्रकाश पर्याप्त है। अब कार्यालय के समय में कोईट्यूब लाइट इत्यादि नहीं जलती है हमारे कक्ष में, बस प्राकृतिक सूर्यप्रकाश।कार्यों के बीच के क्षण उस खिड़की से बाहर दिखती हरियाली निहारने में बीतते हैं।बंगलोर से वर्षा को विशेष लगाव है, जबजमकर फुहारें बरसती हैं तो खिड़की खोलकर वातावरण का सोंधापन निर्बाध आने देता हूँअपने कक्ष में। एक छोटे से प्रयोग से न केवल मेरा मन संतुष्ट हुआ वरन हमारेविद्युत अभियन्ता भी ऊर्जा संरक्षण के इस प्रयास पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर गये।
खिड़की के पास, सूर्य के निकट
प्राकृतिक प्रकाश, पर्याप्त प्रकाश

विकास के नामपर आविष्कार करते करते हम यह भूल गये हैं कि हमारी आवश्यकतायें तो कब की पूरी होचुकी हैं । इतनी सुविधा हर ओर फैली है कि दिनभर बिना शरीर हिलाये भी रहा जा सकताहै। घर में ऊर्जा चूसने वाले उपकरणों को देखने से यह लगता है कि बिना उनके भी जीवनथा और सुन्दर था। तनिक सोचिये,

माचिस के डब्बों से घर बना दिये हैं, उन्हें दिन में प्रकाशमय, गर्मियों में ठंडा और शीतमें गर्म रखने के लिये ढेरों बिजली फूँकनी पड़ती है।
निशाचरीआदतें डाल ली हैं, रात में बिजलीबहाकर दिन बनाते हैं और दिन में आँख बन्द किये हुये अपनी रात बनाये रखते हैं।
विकासबड़े शहरों तक ही सीमित कर दिया है, आनेजाने में वाहन टनों ऊर्जा बहा रहे हैं।
ताजा भोजनछोड़कर बासी खाना प्रारम्भ कर दिया है और बासी को सुरक्षित रखने में फ्रिज बिजलीफूँक रहा है, उसे पुनः गरम करने के लिये माइक्रोवेव ओवेन।
क्या विषय ले बैठा? जस्ट चिल। बिजली फूँकते चलो, ज्ञान बाटते चलो। 
Advertisements