तोड़ महलिया बना रहे

by प्रवीण पाण्डेय

उन्मादितसब जीव, वृक्ष भी,

अन्तरमनभी और दृश्य भी,
एकव्यवस्था परिचायक है,
अह्लादितहैं ईश, भक्त भी,
रहेंविविध सब, पर मिल रहतीं,
भाँतिभाँति की संरचनायें,
एकसृष्टि बन उतरी, फैलीं,
परम ईशकी विविध विधायें,
नहींअधिक है, नहीं कहीं कम,
जितनीजीवन को आवश्यक,
सहज रूपमें स्वतः प्राप्त सब,
प्रकृतिपालती रहे मातृवत,
धरतीमाँ सी, रहती तत्पर,
वन, नद, खनिज अपार सजी है,
तरह तरहके पशु पक्षी हैं,
पुष्प, वृक्ष, फल, शाक सभी हैं,
महासंतुलनसब अंगों में,
एक दूजेके प्रेरक, पूरक,
रहेंपरस्पर सुख से बढ़ते,
सब जीतेहैं औरों के हित,
मानव नेपर अंधेपन में,
अपनीतृष्णा का घट भरने,
सकलप्रकृति को साधन समझा,
ढायेअत्याचार घिनौने,
संकेतोंसे प्रकृति बोलती,
समझो औरस्वीकार करो,
जितनेअंग विदेह किये हैं,
प्रकृतिअंक में पुनः भरो,
देखो सबहै प्राप्त, पिपासाफन क्यों फैले?
सम्मिलितसभी सृष्टि में, फिर क्यों दंशविषैले?
किसकीबलि पर किसका बल हम बढ़ा रहे?
एक नगरथा, तोड़ महलिया बना रहे ।

हर छोरों से आग बरसती, धरती रह रह आज सिसकती


चित्र साभार – http://blog.comixconnection.com/

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