आप उनको याद आयेंगे

by प्रवीण पाण्डेय

जिनस्थानों पर आपका समय बीतता है, उसकीस्मृतियाँ आपके मन में बस जाती हैं। कुछ घटनायें होती हैं,कुछ व्यक्ति होते हैं। सरकारी सेवा में होने के कारण हर तीनचार वर्ष में स्थानान्तरण होता रहता है, धीरे धीरे स्मृतियों का एक कोष बनता जा रहा है, कुछ रोचकता से भरी हैं,कुछ जीवन को दिशा देने वाली हैं। स्मृतियाँ सम्पर्कसूत्र होती हैं, उनकी प्रगाढ़ता तब और गहरा जाती है जब उस स्थान का कोई व्यक्ति आपकेसम्मुख आकर खड़ा हो जाता है।
एकस्थान पर स्थायी कार्यकाल न होना, मेरेजैसे कई व्यक्तियों के लिये एक कारण रहता है, उस स्थान का यथासंभव और यथाशीघ्र विकास करने का, पता नहीं भविष्य में वहाँ पर आना हो न हो। सुप्त सा कार्यकाल बिताने काक्षणिक विचार भी स्वयं को दिये धोखे जैसा लगता है। तीनचार हजार कर्मचारियों की व्यक्तिगत और प्रशासनिक समस्याओं को हल करने कादायित्व आप पर होने से, कई बार आपसेवह न्याय और सहायता भी हो जाती है, जिसकाआपके लिये बहुत महत्व न हो पर वह कर्मचारी उसे भुला नहीं पाता है। उसका महत्व आपकोतब पता चलता है जब कई वर्ष बीतने के बाद भी, सहसा वह व्यक्ति आपके सामने खड़ा हो जाता है।
आत्मकथालिखने का विचार अभी नहीं है, परअवसर पाकर स्मृतियाँ मन से निकल भागना चाहेंगी, संवादक्षेत्रों में अपनानियत स्थान ढूढ़ने के लिये। यह भी आत्मकथा नहीं है, बस एक साथी अधिकारी से बातचीत के समय ये दो घटनायें सामने आयीं तो उसेआपसे कह देने का लोभ संवरण न कर पाया।
एकव्यक्ति कार्यालय खुलने के दो घंटे पहले से आपके कार्यालय के बाहर बैठे प्रतीक्षाकरते हैं, आपके आने की। आने का कोईकारण नहीं, इस नगर में किसी औरकार्यवश आये थे, ज्ञात था कि आपयहाँ हैं अतः मिलने चले आये। अपने गृहनगर की प्रसिद्ध मिठाईयाँ आपको मना करने परभी सयत्न देते हैं, पुरानी कुछघटनाओं को याद करते हैं औऱ अन्त में आपके लिये मुकेश का एक गीत गाकर सुनाते हैं, अपनी मातृभाषा की लिपि में लिखा हुआ। आप किसीनायक की तरह विनम्रता से सर झुकाये सुनते हैं, आपके व्यवहार ने उस व्यक्ति को एक नया जीवन दिया था 7-8 वर्ष पहले।
एकमहिला अपने पुत्र के साथ आपसे मिलने आती है, 7-8 वर्ष पहले की गयी आपकी सहायता से अभिभूत। साथ आये पुत्र के विवाह कानिमन्त्रणपत्र आपको देती है। आपकीआँखें यह सुनकर नम हो जाती हैं कि वह प्रथम निमन्त्रणपत्र था, आप संभवतः इस तथ्यको पचा नहीं पाते हैं कि आपकी कर्तव्यनिष्ठा में की गयी एक सहायता आपको देवतुल्यबना देती है।


यहदोनों घटनायें मेरी नहीं हैं पर जब भी पुराने कार्यस्थल के कर्मचारियों से बातचीतहोती है तो उनके स्वरों में खनकती आत्मीयता और अधिक संबल देती है कि कहीं किसी कीसहायता करने का कोई अवसर छूट न जाये। अधिकार के रूप में प्राप्त इसमहापुण्य का अवसर, पता नहीं, फिरमिले न मिले।
बहते जल मेंनिर्मलता होती है। यह हो सकता है कि यदि एक स्थान पर अधिक रहता तो भावों की नदी कोनिर्मल न रख पाता। एक असभ्य गाँव के लिये न बिखरने की और एक सहृदय गाँव के लिये विश्वभर मेंबिखर जाने की गुरुनानक की प्रार्थना, भले ही मुझे क्रूर लगती रही, भले ही बार बारघर समेटने और बसाने का उपक्रम कष्टकारी रहा हो, पर यही दो घटनायें पर्याप्त हैंगुरुनानक की प्रार्थना को स्वीकार कर लेने के लिये।
जो किनारे छोड़ आया, वो वहीं हैं
चित्र साभार – http://bkmarcus.com/
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