व्यवस्थित परिवेश

by प्रवीण पाण्डेय

सुबह का समय, दोनों बच्चों को विद्यालय भेजने में जुटे मातापिता। यद्यपि बेंगलुरु में विद्यालय सप्ताह में 5 दिन ही खुलते हैं पर प्रतिदिन 7 घंटों से भी अधिक पढ़ाई होने के कारण दो मध्यान्तरों की व्यवस्था है। दो मध्यान्तर अर्थात दो टिफिन बॉक्स अर्थात श्रीमतीजी को दुगना श्रम, वह भी सुबह सुबह। शेष सारा कार्य तब हमें ही देखना पड़ता है। अब कभी एक मोजा नहीं मिलता, कभी कोई पुस्तक, कभी बैज, कभी और कुछ। परिचालन में आने के पहले तक, सुबह के समय व्यस्तता कम ही रहती थी, तो इन खोजबीन के क्रियाकलापों में अपना समुचित योगदान देकर प्रसन्न हो लेते थे। समस्या गम्भीर होती जा रही थी, अस्तव्यस्त प्रारम्भ के परिणाम दिन में दूरगामी हो सकते थे, अतः कुछ निर्णय लेने आवश्यक थे।
अब दोनों बच्चों को बुलाकर समझाया गया। रात को ही अगले दिन की पूरी तैयारी करने के पश्चात ही सोना अच्छा है। प्रारम्भ में कई बार याद दिलाना पड़ा पर धीरे धीरे व्यवस्था नियत रूप लेने लगी। बस्ता, ड्रेस, गृहकार्य इत्यादि पहले से ही हो जाने से हम सबके लिये आने वाली सुबह का समय व्यवस्थित हो गया।
विद्यालय जाने की प्रक्रिया एक उदाहरण मात्र है, घर के प्रबन्धन में ऐसी बहुत सी व्यवस्थाओं को मूर्तरूप देना पड़ता है। हर वस्तु का एक नियत स्थान हो और हर वस्तु उस नियत स्थान पर हो। यदि घर में सामान अव्यवस्थित पड़ा हो, हमें अटपटा लगता है। हमारे पास कितना भी समय हो पर किसी अन्य स्थान पर रखी वस्तु को ढूढ़ने में व्यय श्रम और समय व्यर्थ सा प्रतीत होता है, उपयोग के बाद किसी वस्तु को समुचित स्थान पर रखने में उससे कहीं कम श्रम और समय लगता है।
यह अच्छा है

या यह अच्छा है
एक व्यवस्थित परिवेश में स्वयं को पाने का आनन्द ही कुछ और है। छोटे से छोटे विषय पर किया हुआ विचार किसी भी स्थान को एक सौन्दर्यपूर्ण आकार दे देता है। किसी भी स्थान को व्यवस्थित करने में लगी ऊर्जा उसके सौन्दर्य से परिलक्षित होती है। कुछ लोग कह सकते हैं कि इस व्यवस्था रूपी सौन्दर्य से विशेष अन्तर नहीं पड़ता है पर उन्हें भी अव्यवस्थित स्थान क्षुब्ध कर जाता है।
किसी भी तन्त्र, परिवार, संस्था, समाज और देश का कुशल संचालन इसी आधार पर होता है कि वह कितना व्यवस्थित है। जो कार्य सीधे होना चाहिये, यदि उसमें कहीं विलम्ब होता है या अड़चन आती है तो असहज लगता है। यही असहजता आधार बनती है जिससे तन्त्र और भी व्यवस्थित किया जा सकता है।
कई व्यवस्थायें बहुत पुरानी होती हैं, कालान्तर में न जाने कितने अवयव उसमें जुड़ते जाते हैं, हम अनुशासित से उनका बोझ उठाये चलते रहते हैं। परम्पराओं का बोझ जब असह्य होता है तो उसमें विचार की आवश्यकतायें होती हैं, सरलीकरण की आवश्यकतायें होती हैं। क्या कोई दूसरा मार्ग हो सकता है, क्या प्रक्रिया का समय और कम किया जा सकता है, क्या बिना इसके कार्य चल सकता है, अन्य स्थानों पर कैसे कार्य होता है, बहुत से ऐसे प्रश्न हैं जो घुमड़ते रहने चाहिये। प्रश्न पूछने का भय और अलग दिखने की असहजता हमें अव्यवस्थाओं का बोझ लादे रहने पर विवश कर देती है। जटिल तन्त्रों का बोझ असह्य हो जाता है, सरलता स्फूर्तमयी होती है। प्रबन्धन का सार्थक निरूपण एक व्यवस्थित परिवेश की अनुप्राप्ति ही है।
कोई भी क्षेत्र चुनिये, घर से ही सही, अपने कपड़ों से ही सही, पूछिये कि क्या आपको उन सब कपड़ों की आवश्यकता है? जब तक आप संतुष्ट न हो जायें किसी गरीब को दिये जाने वाले थैले में उनको डालते रहिये।
यही प्रश्न अब हर ओर पूछे जाने हैं, हर तन्त्र सरल होना है, हर तन्त्र व्यवस्थित होना है, हर तन्त्र सौन्दर्यपूर्ण होना है।


चित्र साभार – http://decoratingdesigninterior.com/http://www.lifespy.com/
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