एक के बाद एक

by प्रवीण पाण्डेय

गारफील्ड और ओडी

एक अँग्रेज़ी फिल्म है, गारफील्ड। गारफील्ड एक बिल्ले का नाम है जो अपने मालिक पर अपना एकाधिकार समझता है। एक दिन उसका मालिक, न चाहते हुये भी, अपनी प्रेमिका के दबाव में ओडी नाम का एक छोटा सा कुत्ता घर ले आता है। एकाधिकार से वंचित गारफील्ड सदा ही किसी न किसी जुगत में रहता है कि किस तरह वह ओडी को घर के बाहर भटका दे। एक दिन वह सफल हो जाता है और ओडी सड़क पर होता है। 


स्वभाववश ओडी सड़क पर एक जाते हुये वाहन के पीछे भागता है। चौराहे पर पहुँचते पहुँचते सामने से एक दूसरा वाहन निकलता है, ओडी उसके पीछे भागने लगता है। अगले चौराहे पर पुनः यही क्रम। भागते रहने की शक्ति होने तक वह यही करता रहता है और जब थक कर बैठता है तब उसे घर की याद आती है। वापस पहुँचने में वह घर का रास्ता भूल जाता है।

फिल्म मनोरंजक मोड़ ले अन्ततः सुखान्त होती है, ओडी को घर लाने में गारफील्ड महोदय ही महत भूमिका निभाते हैं।
ओडी के भटकने के दृश्य पर थोड़ा और विचार करें। एक के बाद एक लक्ष्य, सारे के सारे लक्ष्य ऐसे जो प्राप्त होना संभव नहीं, लक्ष्य प्राप्त होने पर भी कोई लाभ नहीं, इस निरर्थक प्रयास में होश ही नहीं कि कहाँ भाग रहे हैं, भागने में इतने मगन कि राह पर ध्यान ही नहीं, अन्ततः निष्कर्ष, घर से दूर और असहाय।
क्या न कर डालें, एक पल में

अब ओडी के स्थान पर स्वयं को रख कर देखिये, अन्यथा मत लीजियेगा क्योंकि मैं स्वयं को ओडी के स्थान पर रख कर समानता का अनुभव कर चुका हूँ। न जाने कितने चौराहे विकल्पों के, पहला लक्ष्य बिना पाये ही निकट से लगते दूसरे लक्ष्य पर दृष्टि, बिना बुद्धि लगाये ऊर्जा का उन्माद, राह की सुधि नहीं, अन्ततः स्वयं से कोसों दूर और स्वयं को ढूढ़ने की आकांक्षा।

ओडी का स्वभाव जो भी रहा हो, क्या हम मनुष्यों को सच में पता नहीं चल पाता कि हमारा स्वभाव क्या है? कौन सा लक्ष्य ग्राह्य है, कौन सा त्याज्य है, गति कितनी अधिक है, मार्ग से कितना भटकाव हो गया है, घर से कितना दूर आ गये हैं, कितना अभी और चलना है, कब तक वापस पहुँचना होगा, कब विश्राम होगा? इनके उत्तर निश्चय ही केन्द्रबिन्दु से नियन्त्रित सम्पर्क बनाये रखते हैं, पर राह में आये विचारों से भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, लक्ष्य की उपादेयता। क्या लक्ष्य आपके योग्य है, क्या लक्ष्य आपके वर्तमान जीवनस्तर को और उठाने में सक्षम है?
चरैवेति चरैवेति अनुपालक मन्त्र है, उसमें चलते रहने का संदेश है, पर जीवन में हम कब भागने लगते हैं, पता ही नहीं चलता है और जब तक पता चलता है, हम अपने घर से बहुत दूर होते हैं, स्मृतिभ्रम की स्थिति में, असहाय, अपनेपन में कुछ समय बिताने को लालायित।
गति, ऊर्जा, उपादेयता, सुख आदि के विविध दिशोन्मुखी वक्तव्यों के बीच खड़ा है हमारा जीवन, एक के बाद एक न जाने कितने लक्ष्य सामने से निकले जा रहे हैं और निकला जा रहा है मिला हुआ समय।
इस गतिशीलता में आपका हर निर्णय महत्वपूर्ण है, एक के बाद एक।

चित्र साभार – http://www.ocpsychotherapy.com/, Garfield Movie

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