कार्य की बस चाह मेरी

by प्रवीण पाण्डेय

कार्य की बस चाह मेरी, राह मिल जाया करें,

देख लेंगे, कष्ट दुष्कर, आयें तो आया करें।
व्यक्त है, साक्षी समय है, मन कभी डरता नहीं,
दहकता अस्तित्वअंकुरहृदय में मरता नहीं।
कब कहा मैंने समय से, तनिक तुम अनुकूल हो,
सब सहा जो भी मिला पथ, विजय हो या भूल हो।
लग तो सकते हैं हृदय में, तीर शब्दों के चले,
मानसिक पीड़ा हुयी भी, वो हलाहल विष भरे।
एक दिन सहता रहा मैं, वेदना की पूर्णता,
चेतना पर लक्ष्य अंकित, खड़ा जीवट सा बढ़ा।
भूत मेरे निश्चयों की कोठरी में बंद है,
आज का दिन और यह पल, यहीं से आरम्भ है।
समय संग में चल सके तो, बढ़ा ले गति तनिक सी,
अब नहीं विश्राम लेना, अब नहीं रुकना कहीं।
आश्रितों की वेदना से व्यक्त यह संसार है
यही मेरे परिश्रम का, ध्येय का आधार है।
नहीं चाहूँ पद, प्रतिष्ठा, स्वयं पर निष्ठा घनेरी,
नहीं आशा प्रशंसा की, कार्य की बस चाह मेरी ।

राह मिल जाया करें

चित्र साभार – http://judson2history.wordpress.com/

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