काश तुम्हें होता यह ज्ञात

by प्रवीण पाण्डेय

काश तुम्हें भी होता ज्ञात

मौन बहा शब्दों के पार,

हृदय समेटे यह उपकार ।
समयशून्य हो जगत बसाया,
सपनों का विस्तार सजाया ।
चंचलता का झोंका, मुझको भूल गयी तुम,
पेंग बढ़ा कर समय डाल पर झूल गयी तुम,
सहसा जीवन में फिर से घिर आयी रात,
काश तुम्हें होता यह ज्ञात ।1
सभी बिसारे जाते सार,
आकृति क्या पायेगा प्यार।
आँखों का आश्रय अकुलाया,
ढेरों खारा नीर बहाया।
तुमको किसने रोका, क्यों स्थूल हुयी तुम,
तेज हवायें ही थीं, क्यों प्रतिकूल हुयी तुम,
मन रोया है, तुमको जब घेरें संताप,
काश तुम्हें होता यह ज्ञात ।2
है संवाद नहीं रुक पाता,
कह देने को उपजा जाता,
जाने कितनी सारी बातें,
शान्त बितायी अनगिन रातें,
संसाधन थे, उनमें डूबी, तृप्त रही तुम,
अत्म मुग्ध हो अपने में अनुरक्त रही तुम,
शब्द नहीं पर नित ही तुमसे होती बात,
काश तुम्हें होता यह ज्ञात ।3
रिक्त कक्ष क्यों, मन लड़ता है,
हृदय धैर्यभाषा गढ़ता है।
अभिलाषा, सुधि आ जायेगी,
तुम्हें प्रतीक्षा पा जायेगी।
कितना बदले रंग, किन्तु हो अभी वही तुम,
देखूँ कितनी बार, हृदय में वही रही तुम
पीड़ा बनकर बरस रही रिमझिम बरसात,
काश तुम्हें होता यह ज्ञात ।4

चित्र साभार – राजा रवि वर्मा
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