डायरी का जीवन

by प्रवीण पाण्डेय

बहुत दिन हो गये, डायरी नहीं लिखी। ऐसा नहीं है कि जीवन में कुछ घट नहीं रहा है, ऐसा भी नहीं है कि मैं लिख नहीं रहा हूँ, पर पता नहीं क्यों डायरी नहीं लिख पा रहा हूँ। डायरी लिखना एक अत्यन्त अनुशासनात्मक कार्य है और बहुधा अनुशासन अवसर पाते ही सरक लिया करता है जीवन से। मन में बहुत कुछ चलता रहता है, बहुत ही व्यक्तिगत, साधारणतया बाहर आता ही नहीं है, सार्वजनिक लेखन में तो कभी भी नहीं। डायरी ही एक ऐसा माध्यम है जिसमें आप अपने व्यक्तिगत क्षणों को उतार सकते हैं और वह भी निःसंकोच। बहुत बार जब डायरी में औपचारिक होने लगता हूँ तो स्वयं पर हँसता हूँ, लगता है किसी और के लिये लिख रहा हूँ, किसी नाटक में किसी और पात्र को जी रहा हूँ। स्वयं को स्वयं समझ स्वयं के लिये लिख लेना ही डायरी लेखन है।
मन गहरा  उलीच दो, लिख दो

डायरी लिखने का एक और लाभ होता है, स्वयं से पारदर्शिता। जब औपचारिकताओं को न बता कर गहरी बातों को करना हो तो व्यक्ति स्वयं से निश्छल रहता है। विवशताओं के बीच उसे एक ठौर मिलता है मन को व्यक्त करने का। जीवन में विवशताओं का विष न चढ़े इसके लिये आवश्यक है कि वह निकलता रहे किसी न किसी माध्यम से। इस कार्य के लिये डायरी से अधिक आत्मीय क्या और हो सकता है भला?

अपनी लिखी हुयी डायरी के पृष्ठों को पुनः पढ़ना एक विशेष अनुभव है। आपके वास्तविक जीवन का जो प्रक्षेप होता है उससे नितान्त अलग दिखता है डायरी में व्यतीत किया हुआ जीवन। आप यह मानकर तो चलिये कि यदि किसी के मन में अपने जीवन का सत्य सहेजकर रखने का संकल्प है तो वह सत्य को बचाकर रखना चाहेगा, अपनी सुरक्षा के लिये या अपने विकास के लिये। मुझे अपने जीवन के व अपनी डायरी के तटों में बहुत अधिक निकटता दिखायी पड़ती है, पतली सी धारा में बहता निश्चित सा जीवन। बहुत महापुरुष ऐसे हैं जिनकी डायरी को पढ़ना न केवल रुचिकर रहता है वरन उसमें रहस्यों के उद्घाटन की विशेष संभावनायें बन जाती हैं। विकीलीक्स जैसा विस्फोटक कुछ भी न हो पर फिर भी बहुत कुछ ऐसा निकल आता है जिस पर चर्चाओं का बवंडर मचा ही रहता है, बहुत दिनों तक।
मैं यही सोचता हूँ कि कभी मेरी डायरी इस तरह अपने रहस्य खोलेगी तो कितना बवाल मचेगा? जीवन जब सपाट राह में भाग रहा हो तो इस संदर्भ में बहुत अधिक संभावना नहीं है कि कुछ रोचक मिलेगा। मर्यादावश जिन भावों को मन में छिपाना पड़ा है, बस वही निकलने को उतावले होंगे। बहुधा मन मानता नहीं है बिना अपनी बात कहे। किसी तरह उसको मना कर उसका पक्ष ही डायरी में लिखना पड़ता है। यद्यपि डायरी में लिख लेने भर से पूरा द्वन्द शमित नहीं हो पाता है पर एक सन्तोष बना रहता है कि मन और मर्यादा को समान अवसर दिया गया।
डायरी लेखन किसी संभावित निष्कर्ष को ध्यान में रख कर नहीं होता है, पर उसमें विस्फोट की संभानायें बनी रहती हैं। कुछ भी हो, आपबीती को औरों के दृष्टिकोण से न देखकर स्वयं से बतियाने का एक सशक्त माध्यम हो सकता है डायरी लेखन। स्वयं से बतियाना, अपने अन्दर देखना, अपनी क्षमताओं को स्वयं आकना और आत्मसाक्षात्कार का एक सशक्त माध्यम हो सकता है डायरी लेखन। दिन में कुछ पल सच के बीच बिताने का माध्यम हो सकता है डायरी लेखन। स्वयं को समझाने और मनाने का माध्यम हो सकता है डायरी लेखन।
डायरी का जीवन हृदय के निकटतम होता है।
चित्र साभार – http://www.flickr.com/photos/dou_ble_you/
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