बोसॉन या फर्मिऑन

by प्रवीण पाण्डेय

भौतिकी का सिद्धान्त है पर समाज में हर ओर छिटका दिखायी पड़ता है। हर समय यही द्वन्द रहता है कि क्या बने, बोसॉन या फर्मिऑन। मानसिकता की गहराई हो या अनुप्राप्ति का छिछलापन, प्रचुरता की परिकल्पना हो या संसाधनों पर युद्ध, साथ साथ रह कर जूझना हो या दूसरे के सर पर पैर धरकर आगे निकलना। हर समय कोई एक पक्ष चुनना होता है हमें। हम मानवों के अन्दर का यह द्वन्द जगत की सूक्ष्मतम संरचना में भी परिलक्षित है। आईये देखें कि क्या होता है उनके परिवेश में। इस व्यवहार के क्या निष्कर्ष होते हैं और उस सिद्धान्त को किस तरह हम अपने सम्मलित भविष्य का सार्थक आकार बनाने में प्रयुक्त कर सकते हैं।
दो तरह के उपकण (सब पार्टिकल्स) होते हैं, अपने व्यवहार के आधार पर, व्यवहार जो यह निश्चित करेगा कि कण का आकार कैसा होगा। लगभग 16 प्रकार के उपकणों को इन्हीं दो विभागों में बाटा गया है, 4 बोसॉन्स और 12 फर्मिऑन्स। नामकरण हुआ है, दो महान वैज्ञानिकों के नाम पर, सत्येन्द्र नाथ बोस एवं एनरिको फर्मी जिन्होंने पदार्थ और ऊर्जा के व्यवहार को एक सशक्त गणितीय आधार दिया।
हर उपकण की एक ऊर्जा होती है, उस ऊर्जा के आधार पर उसका एक नियत स्थान होता है जिसे उसकी कक्षा कहते हैं। एक बोसॉन अपने जैसे उपकणों को अपनी ओर आकर्षित करता है और उसके साथ रहकर अपनी ऊर्जा कई गुना बढ़ाता जाता है। एक फर्मिऑन अपने जैसे उपकणों को अपने पास नहीं आने देता है और समान ऊर्जा की भिन्न भिन्न कक्षाओं में रहकर एक दूसरे की निस्तेज करता रहता है।
बने बोसॉन, बने लेज़रवत
जब बोसॉन मिलना प्रारम्भ करते हैं तो लेज़र जैसी सशक्त संरचना बनाते हैं, इतनी सशक्त जो बिना अपना तेज खोये हजारों मील जा सकती हैं, इतनी सशक्त जो मीटर भर के लौह को सफाई से काट सकती है, इतनी सशक्त जो किसी भी माध्यम से टकराकर बिखरती नहीं है। कारण सीधा सा है, अपने जैसों को अपने साथ लेकर चलना ही बोसॉन्स को इतनी शक्ति दे जाता है। फर्मिऑन्स साधारण कणों का निर्माण करते हैं, हर जगह पाये जाने वाले, अपनी अपनी कक्षा में सुरक्षित।
आईये, अपने अपने हृदय पर हाथ रख स्वयं से पूछें कि हमारे सम्पर्क में हमारी जैसी प्रतिभा वाला, हमारे जैसे गुणों वाला कोई व्यक्तित्व आता है तो हमारे अन्दर का बोसॉन तत्व जागता है या फर्मिऑन तत्व। न जाने कितनी बार हमारा विश्वास हिल जाता है कि कहीं यह हमारा स्थान न ले ले या हमसे आगे न निकल जाये। हमें अपनी कक्षा असुरक्षित सी लगने लगती है, हम उसे अपनी कक्षा में आने नहीं देते हैं, हम फर्मिऑन बन जाते हैं।
कई समुदायों को देखा है कि अपनों को सदा ही साथ लेकर चलते हैं, अपनी कक्षा में थोड़ा और स्थान बना लेते हैं, वे प्रचुरता की परिकल्पना के उपासक होते हैं, उन्हें लगता है कि उनके क्षेत्र में सबके लिये संभावनायें हैं। जिस समय भारत में सत्ता के लिये राजपुत्रों का संघर्ष एक लज्जाजनक इतिहास लिखने को तैयार था, यूरोप में प्रचुरता के उपासक नये महाद्वीप ढूढ़ने में व्यस्त थे। पृथ्वी उर्वरा है, उसके अन्दर हम जैसी 6 जनसंख्याओं का पालने का सामर्थ्य है पर हम बीघा भर भूमि के लिये उसे अपने भाईयों के रक्त से सींच देते हैं। यह हमारी मानसिकता ही है जो हमें प्रचुरता की स्थिति में भी सीमितता का आभास देती है।
गरीबी में साथ साथ रहना है, कष्ट में साथ साथ रहना है, विपत्ति में साथ साथ रहना है, वैभव होगा तब अन्य विषयों पर शास्त्रार्थ कर लेंगे। आप निर्धारित कर लें कि आपको लेज़र बनना है कि धूल बनकर पड़े रहना अपनी अपनी कक्षाओं में सुरक्षित। आप निर्धारित कर लें कि आपको बोसॉन बनना है या फर्मिऑन।
बोसॉनीय उत्सव
चित्र साभार – http://www.4to40.com/http://www.discobelle.net/
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