चमचों का स्थान

by प्रवीण पाण्डेय

एक बार शतरंज खेलते समय यह विचार उभरा कि यदि वास्तविक जीवन के समकक्ष इस खेल में भी चमचों का स्थान होता तो उन्हें कहाँ बिठाया जाता, उनकी क्या शक्तियाँ होतीं और उनकी चाल क्या होती? बड़ा ही सहज प्रश्न है और इस तथ्य को खेल के आविष्कारकों ने सोचा भी नहीं। संभवतः उस समय किसी भी क्षेत्र में इतने चमचे न होते होंगे और यदि होते भी होंगे तो उनका प्रभाव क्षेत्र इतना व्यापक न होता होगा। धीरे धीरे विस्तार इतना व्यापक हो गया है कि बिना उनके किसी भी क्षेत्र में ज्ञान का प्रादुर्भाव होना संभव ही नहीं। बिना उनके कुछ भी होना आश्चर्यवत ही देखा जाता है।
तोरे चरण कहाँ साँवरिया

चमचों को शतरंज के बोर्ड में समायोजित करने के लिये बोर्ड का आकार बड़ा करना पड़ेगा क्योंकि राजा के चारों ओर 8 खानों में उनके अतिरिक्त कोई और मोहरा न रह सकेगा। राजा को एक खाना चलने के लिये यह आवश्यक होगा कि उनके चमचों के लिये भी स्थान उपलब्ध रहे। कोई एक भी स्थान भरा होने की स्थिति में राजा का हिलना वैसे ही असम्भव होगा जैसा कि अभी होता है। नियम तब यह भी बनेगा कि वह स्थान बनाने के लिये अपने राजा के मोहरे मारने का अधिकार चमचों को रहेगा।

राजा को शह लगते ही सारे चमचों को बोर्ड से हटा लेने का प्रावधान हो, बचाव की शक्ति प्रमुख मोहरों को ही रहे। मात बचाने के प्रयास में निकट आये सारे मोहरों को बचाव होते ही अपना स्थान छोड़ना होगा और चमचों को उनका स्थान समुचित और सादर सौंपना होगा। शान्ति के समय में राजा से निकटता  का अधिकार केवल चमचों को ही हो। वास्तविक जीवन परिस्थितियों को शतरंज में उतारने के प्रयास में शतरंज का खेल गूढ़तम हो जायेगा, आनन्द आयेगा और कुछ सीखने को मिलेगा।
चमचों ने पूरा सामाजिक परिदृश्य बदल दिया है। अधिकारों के प्रवाह का नियन्त्रण अब सीधा नहीं रह गया है, जगह जगह पर बाँध बन गये हैं, जितनी बड़ी नदी, उतने बड़े बाँध, प्रवाह रोक कर बिजली पैदा की जा रही है, बेहिसाब। बाँधों के आसपास के खेत लहलहा रहे हैं। दूर क्षेत्रों में न बिजली पहुँची है और न ही पानी, सब बाँधों ने रोक लिया है।
शतरंज और समाज तो निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि चमचों को कहाँ स्थान मिले पर चमचों को अपने स्थान के बारे में कोई संशय नहीं है। अपने स्वामी को अपने हृदय में बसाये कहीं भी किसी के भी विरुद्ध गरल वमन करने में सक्षम चमचे, उस हर समय वहाँ पाये जाते हैं, जहाँ जहाँ स्वामी पर कोई आँच सी संभावना दिखती है। पहले तो कुछ भी बोल देते हैं और बिना विषय के भी एक सदी पहले के प्रसंगों का संदर्भ दे देते हैं। संवाद स्पष्ट सा है, अर्थ आपको समझ आये न आये, भावनाओं को समझो।
लोकतन्त्र के किसी मनीषी ने इस प्रजाति के बारे में कल्पना तक भी नहीं की होगी और अब स्थिति यह आ गयी है कि इन्हें लोकतन्त्र का पाँचवा स्तम्भ समझा जा रहा है।
क्या कहा, क्या ऐसा नहीं है, ध्यान से देखना होगा।
पास जाकर ध्यान से अवलोकन होता है, स्तम्भ और आधार के बीच हवा है।
अरे, यह स्तम्भ तो लटका हुआ है लोकतन्त्र में, यही इसका स्थान और स्वरूप है।
चित्र साभार – http://www.flamewarriors.com
Advertisements