देवेन्द्र दत्त मिश्र

by प्रवीण पाण्डेय

पहली बार मिला प्रशासनिक कार्य से, अभिरुचियों की चर्चा हुयी, पता चला साहित्य में रुचि है तो दोनों साथ हो लिये मेरे वाहन में, दो घंटे की यात्रा, संवाद की गूढ़ता में डूबे हम लोगों को ड्राइवर महोदय ने ही बताया कि सर, घर आ गया है। जीवनयात्रा में यात्राओं ने बहुत कुछ दिया है, मिला एक और उपहार, मुझे भी, साहित्य को भी और संभवतः ब्लॉग जगत को भी।
बहुधा ऐसा होता है कि हम अपनी योग्यताओं को अकारण किसी पर थोपते नहीं हैं, एक कारण बहुत ही सौम्य होता है, हमारी विनम्रता, पर उसमें हमें अपनी योग्यताओं का भान सतत रहता है, व्यक्तित्व में गुरुता बनी रहती है। दूसरा कारण प्राकृतिक होता है, फक्कड़ी जैसा, योग्यता गुरुता नहीं लाती व्यक्तित्व में, व्यवहार की सहजता में मात्र प्रसन्नता ही बिखरती है चहुँ ओर, लहरों के उछाल में पता ही नहीं चलता कि सागर कितना गहरा है।
दो घंटों की बातचीत, न जाने कितने पक्ष खोलती गयी, एक के बाद एक, बीज से प्रारम्भ हुआ ज्ञान का वटवृक्ष बन फैलता गया, न जाने कितना क्षेत्रफल समेटे मुठ्ठीभर मस्तिष्क में। मेरा सौभाग्य ही कहेंगे इसे कि मेरे सम्मुख वह खुलते गये।
अनुभव की व्यापकता मशीनी मानव से भिन्न व्यक्तित्व निर्मित करती है, एक विशेष, विशद, समग्र दृष्टिकोण लिये। न जाने कौन सा अनुभव कब काम आ जाये, किस नये क्षेत्र में उसका उपयोग एक क्रान्ति का प्रादुर्भाव कर बैठे, इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से। सामाजिक व व्यवहारिक रूपों में उन अनुभवों का समन्वय जो निष्कर्ष लेकर आता है, उसकी प्रतीक्षा में ही सकल विश्व बाट जोहता बैठा रहता है, हर प्रभात के साथ। मैं मैराथन में अनुभव किये सत्य जब परिवार में लगाता हूँ तो धैर्य जैसे गुणों को सम्मानित स्थान मिल जाता है। लेन्ज का नियम पुत्र के तेवर बताने लगता है। गणित का सवाल हल कर लेने का उत्साह छोटी छोटी बातों में प्रसन्न हो जाना सिखा देता है। अंतरिक्ष की विशालता में स्वयं का स्थान जीवन से गुरुता निकाल फेंकती है। विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवजन्य सत्य जीवन का अस्तित्व सुखद करने में लगे हुये हैं।
देवेन्द्र दत्त मिश्र
एक इलेक्ट्रिकल इन्जीनियर, आई आई एम बंगलोर से प्रबन्धन के परास्नातक, मेट्रो प्रोजेक्ट के 6 वर्ष के अग्रिम अनुभव में पके, विदेश में कार्यसंस्कृति के प्रशिक्षण में पगे, अध्यात्म के संदर्भों के जानकार, साहित्य में प्रबल हस्तक्षेप रखने वाले, कवि हृदय, सहजता के सुरवेत्ता और अपने सब गुणों को अपनी फक्कड़ी के भीतर छिपाये देवेन्द्र दत्त मिश्र से जब आप मिलेंगे तो उनकी मुस्कराहटपूर्ण आत्मीयता आपको उनके साथ और संवाद करने को विवश कर देगी।
मेरा स्वार्थ बड़ा साधारण सा था, उन्हे कुछ लिखने के लिये प्रेरित करना। पर मेरा विश्वास उतना साधारण नहीं है, जो यह माने बैठा है कि उनके अनुभव के छन्नों से छनकर जो सृजन उतरेगा, वह साहित्य व ब्लॉग जगत के लिये संग्रहणीय होगा। मेरे कई बार उलाहना देने पर उन्होने अपना ब्लॉग प्रारम्भ कर दिया है और सम्प्रति प्रबन्धन जैसे गूढ़ विषय को हिन्दी में लाने का महत प्रयास भी कर रहे हैं। उन्होने इन्फोसिस के प्रबन्धन पर लिखी पुस्तक को आधारस्वरूप लिया है, इस कार्य के लिये। दर्शन का संपुट, कविता का संप्रेषण, प्रबन्धन की गूढ़ता, सब एक में समाहित।
एक और विमा, साहित्य के घेरे में, संवर्धन की प्रक्रिया कई विषयों के लिये। स्वागत कर लें उनका, उत्साह बढ़ा दें उनका और आशा करें कि क्षमतानुसार और समयानुसार जितना भी लिख पायें वे, लिखते रहें।
इतना ही स्वार्थ हो हम सबका भी।
Advertisements