बसन्त का सन्त

by प्रवीण पाण्डेय

यह एक सुन्दर संयोग ही है कि वैलेन्टाइन दिन बसन्त में पड़ता है। बसन्त प्रकृति के उत्साह का प्रतीक है और प्रेम प्रकृति की गति का। प्रेम का यह प्रतीकोत्सव भला और किस ऋतु को सुशोभित करता? आधुनिक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में कुछ प्रश्न उभरते हैं। क्या प्रेम का अर्थ भिन्न संस्कृतियों में भिन्न होता है? प्रेम के आवरण में फूहड़ता का आचरण क्या किसी की सांस्कृतिक विरासत का अंग हो सकता है? प्रेम का सांस्कृतिक स्वरूप क्या किसी देश या समाज की सीमा में बँध कर रह सकता है? हर बार जो उत्तर मिलता है, वह धीरे धीरे सबको समेट लेता है, अपने अन्दर। जैसे जैसे प्रेम की गहराई में उतरने का यत्न करेंगे, वह दैहिक, मानसिक, बौद्धिक सीमाओं को समेटता हुआ अध्यात्मिकता में डूब जाता है।
प्रेम में अध्यात्म जैसा शब्द जोड़ते ही, बहुतों को लगता है कि, उसमें रोचकता निचोड़ ली गयी, अब होगी कोई नीरस सी असहनीय, अचंचलात्मक बातें। प्रेम की गहराई में उतरते ही उसमें ऐसा भारीपन आ जायेगा जो सबके बस की बात नहीं। मीरा का पागलपन, गोपियों की व्यथा, प्रेम की गहनतम अभिव्यक्तियाँ हैं। यह गुरुता उन लोगों को असहनीय है जिनके लिये प्रेम का उद्भव, अभिव्यक्ति और निरूपण एक नियत दिन में ही हो जाने चाहिये। आप कहें कि चलिये प्रेम को कम से कम एक माह में पल्लवित करें या बसंत में बढ़ायें तो आप पर आरोप लग जायेंगे कि आप वैलेन्टाइन बाबा का अपमान कर रहे हैं क्योंकि प्रेम के लिये एक नियत दिन है। क्या वैलेन्टाइन बाबा ने कहा था कि उन्हें एक दिन का कारागार दे दो?
मेरा 14 फरवरी से कोई विरोध नहीं अपितु वैलेन्टाइन बाबा के प्रति अगाध श्रद्धा है। हो भी क्यों न, प्रेम ही सकल विश्व की गति का एकल महत्वपूर्ण कारण है। अपने जीवन से प्रेम हटा दीजिये, आप जड़वत हो जायेंगे। प्रेमजनित गतियाँ असाधारण होती हैं, रोचक भी। उस असाधारणता को एक दिन में सीमित कर देना बाबा का अपमान है, प्रेम का भी। देखिये न, जिस सन्त ने प्रेम का पटल एक दिन से बढ़ाकर जीवन भर का कर देने का प्रयास किया, उसका प्रतीक पुनः हमने एक दिन में समेट दिया।
श्रुतियों के अनुसार, सैनिकों को विवाह की अनुमति न थी, कारण यह कि वे किसी आकर्षण में बँधे बिना ही पूरे मनोयोग से युद्ध करें। यह एक कारण था जिससे बिना विवाह  ही एक दिवसीय सम्बन्धों को आश्रय मिलता था। वैलेन्टाइन बाबा के प्रयासों से वह सम्बन्ध जीवनपर्यन्त बने, विवाह को मान्यता मिली और समाज को नैतिक स्थिरता। प्रेम में जो जितना गहरा उतरेगा, उसको उतना खजाना मिलेगा। सतह पर छींटे बिखेरेंगे तो सतही सुख मिलेगा, गहराई की डुबकी लगायेंगे तो मन के कोमलतम भावों में पगे रत्न होंगे आपके जीवन में। गहरापन बिना समय व्यय किये नहीं आता है, वर्षों की सतत साधना और तब स्पष्ट होता है प्रेम। प्रेम एक दिन का कर्म नहीं, वर्षों का मर्म है।
गहराई के साथ साथ प्रेम में एक विस्तार भी है। किसी की मुस्कराहटों पर निसार हो जाना, किसी को समझ लेना और किसी का दर्द बाटने की अभिलाषा ही प्रेम है। प्रेम तो बादल की तरह भरा हुआ होता है जो बरसना चाहता है या होता है धरती की तरह जो सब कुछ अपने भीतर समाहित कर लेने को आतुर होती है और उसे हजार गुना करके लौटा देती है। प्रेम समर्पण की धरा पर उत्पन्न होता है, निःस्वार्थ भाव से बढ़ता है और विराट हो जाता है, मानवता का विस्तार लिये। सच्चा प्रेम  किसी दिनविशेष से परे सतत पल्लवित होता रहता है।

वैलेन्टाइन बाबा ने तो प्रेम को विस्तार और गहराई दी थी, हमने ही उसे एक दिन में और सतही आकर्षण में समेट दिया। आप ही बताईये कि प्रेम के गूढ़ विषय में किसी की सतही समझ और तज्जनित फूहड़ता के कारण मैं उस सन्त पर श्रद्धा रखना कैसे कम कर दूँ, जिसने प्रेम को सही सामाजिक रूपों में स्थापित किया? मेरे लिये तो वह बसन्त के सन्त हैं।
Advertisements