बहता समीर

by प्रवीण पाण्डेय

अपने घर से निकलकर मित्र के घर पहुँचने तक की कार यात्रा में जीवन का दर्शन समेट कर रख दिया, सहयात्रियों को देखते, उनके बारे में बतियाते, उनके मन में झाँकते। अनुभवों की अभिव्यक्ति इतनी सशक्त कि हर घटना एक नया दृष्टिकोण लिये निकली। कोई गुरुता नहीं शब्दों में, वाक्यों में, पृष्ठों में, सब कुछ बड़े ही सरल ढंग से, ग्रहणीय, संदर्भों की जटिल पृष्ठभूमि से परे। स्वनामजन्य प्रवाह, तार्किक प्रबलता, मानवीय दुर्बलताओं का विनोदपूर्ण पर आक्षेपविहीन अवलोकन, समाजिक सुन्दर पक्षों का काव्यमय समावेश, निष्कर्ष देख लूँ तो चलूँ
देखा हुआ दिखा भी दिया
एक साहित्यिक कृपा की समीरलाल जी ने कि मुझे अपनी पुस्तक की हस्ताक्षरित प्रति भेजने के योग्य समझा। उसी समय हर्षातिरेक में दो तीन पृष्ठ पढ़ गया, पर लगा कि पुस्तक का सम्मान उसे एक प्रवाह में पढ़ने में है, न कि खण्ड खण्ड। अगली लम्बी ट्रेन यात्रा का दिन निर्धारित कर लिया गया। यात्रा का सामान सजाते समय यह पुस्तक सबसे ऊपर रखी गयी, भेंट का समय आ गया, 16-02-11, कर्नाटक एक्सप्रेस, ए केबिन, बच्चे और उनकी माँ दोपहर का भोजन कर सामने वाली बर्थों में निद्रा में डोलते हुये, दौंड और भुसावल के बीच का सुन्दर परिदृश्य, खिड़की से छनकर हल्की सी धूप अन्दर आती हुयी, पढ़ने का निर्मल एकान्त, उस पर 77 पृष्ठों का अपरिमित आनन्द, एक प्रवाह में पढ़ लगा, लगभग उतने ही समय में जिसमें समीरलाल जी की कार मित्र के घर पहुँच गयी।
यात्रायें कुछ न कुछ नया लेकर आती हैं, हर बार। कार यात्रा, ट्रेन यात्रा, जीवन यात्रा, सबमें एक अन्तर्निहित समानता है, एक को दूसरे से जोड़कर देखा जा सकता है। यही सशक्त पक्ष है पुस्तक का भी, यात्रा में कुछ न कुछ दिखता रहता है, उससे सम्बन्धित जीवन के तथ्य स्वतः उभर कर सामने आ जाते हैं। यह शैली अपनाकर दर्शन के तत्वों को भी सरलता उड़ेला जा सकता है। पर दो खतरे हैं इसमें। पहला, असम्बद्ध विषयों को जोड़ने का प्रयास बहुधा कृत्रिम सा लगने लगता है। दूसरा, हर विषय को जोड़ते रहने से पुस्तक का स्वरूप डायरीनुमा होने लगता है। इन दोनों खतरों को कुशलता से बचाते हुये दर्शन और जीवन का जो उत्कृष्ट मिश्रण समीरलालजी ने प्रस्तुत किया है, वह मात्र सुगढ़ चिन्तन और स्पष्ट चिन्तन-दिशा से ही सम्भव है।
कभी एक शब्द विशेष की उपस्थिति संवाद को संक्षिप्तता से कह जाती है, कभी वाक्यों का समूह जीवन का रहस्य उद्घाटित करता है, कभी कविता दर्शन की गहनता को समेट देती है, हर शब्द, हर वाक्य, हर पृष्ठ, व्यस्त सा प्रतीत होता है, कुछ न कुछ कह देने के लिये। उनके व्यस्त जीवन का प्रक्षेप है लेखन में भी, सब कुछ समेट लेने की शीघ्रता। विक्रम सेठ के सूटेबल ब्वॉय या अरुन्धती रॉय की द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग लिखने जितना समय और धैर्य होता तो 77 पृष्ठों का लेखन 770 पृष्ठों में भी न समा पाता। चलिये, इस बार पाठक सूप से संतुष्ट हो गये हैं, पर भविष्य के लिये पढ़ने की भूख भी बढ़ गयी और स्वादिष्ट भोजन की आस भी।
विषयवस्तु पर जाने से उसकी प्रशंसा में कई अध्याय लिखने पड़ जायेंगे। उसका भार सुधीजनों पर छोड़ बस इतना ही कहना चाहूँगा कि सबके जीवन से जुड़ी नित्य की घटनायें एक माध्यम होती हैं कुछ गहरा कहने के लिये। माध्यम का सुन्दर उपयोग, अवलोकन की कुछ और सीमायें निर्धारित कर देने के लिये, इस कृति की विशेषता है। पुस्तक पढ़ने के पश्चात अब वे घटनायें वैसी नहीं दिखेंगी, जैसी अब तक दिखती आयी हैं, उस पर समीरलालजी के हस्ताक्षर दिखायी पड़ जायेंगे आपको।
मैं नहीं जानता कि मेरा अवलोकन कितना गहरा रहा, पर और गहरे जाने से उन उद्देश्यों को उभार न पाता जिसके लिये यह पुस्तक लिखी गयी होगी। पुस्तक लिखने का उद्देश्य और अभीष्ट पाठकगण, दोनों ही मानकों पर पुस्तक खरी उतर आने के कारण मैं स्वयं संतुष्ट था। नदी में गहरा उतरने से पूरी तरह डूब जाने का खतरा तो रहता ही है।
यदि आपने पुस्तक नहीं पढ़ी है तो तुरन्त पढ़ डालें, इतना सरल-हृदय-संप्रेषण विरला ही होता है।  
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