विभावरी शेष, आलोक प्रवेश

by प्रवीण पाण्डेय

नहीं तुम्हे देखा है कब से
नित स्वयं से एक रार ठनती है, नित मैं हारता हूँ, दिन की मेरी पहली हार, मन की पहली जीत। जब उठता हूँ, सूर्यदेव अपनी विजय पर मुस्करा रहे होते हैं, खुल कर, मैं पुनः कुछ घंटे खो देता हूँ सुबह के, कुछ और जीवित स्वप्न आगे सरक जाते हैं समयाभाव में, मैं निद्रास्वप्न में पड़ा रहता हूँ। चाह कर भी सुबह नहीं उठ पाता हूँ, दिन का स्वागत नहीं कर पाता हूँ। आत्मग्लानि न होती, यदि यह सोचकर न सोया होता कि सुबह सूर्योदय के पहले उठना है। कोई बन्धन नहीं, किसी की आज्ञा नहीं, कार्य देर सबेर हो रहे हैं, सुबह का खोया समय रात में निकाल लेता हूँ, पर स्वयं से रार ठनी है।
बचपन से देखता आया हूँ, बहुतों को जानता हूँ, सूर्योदय के पहले नित्यकर्म आदि से निवृत्त हो जीवन प्रारम्भ कर देते हैं। शास्त्रों में पढ़ा है, प्रातकाल का समय दैवीय होता है, पढ़ा हुआ याद रहता है, मन विषय पर एकाग्र रहता है, सुविचारों का प्रभाव रहता है, सृजन का सर्वोत्तम समय। प्रकृति का संकेत, शीतल बयार बहने लगती है, पंछी चहचहाने लगते हैं उत्सव स्वर में, एक विशेष स्वर गूँजने लगता है वातावरण में, स्पष्ट संकेत देता हुआ, जागो मोहन प्यारे।
आलस्य के रथ पर आरूढ़, मैं निश्चेष्ट पड़ा रहता हूँ। ऐसा नहीं है कि नींद खुलती नहीं है, पता चल जाता है कि सुबह हो गयी है पर मन को जीत पाने का प्रयास नहीं कर पाता हूँ, मन के द्वारा प्रस्तुत किसी न किसी बहाने को अपना मान बैठता हूँ, एक बार और डुबकी नींद में और आधे घंटे शहीद।
रॉबिन शर्मा को पढ़ा, कहते हैं बिना सुबह 5 बजे उठे आत्मविकास संभव ही नहीं, पहले पग में ही लुढ़क गया मेरा लक्ष्य। 5 बजे उठें तो समय मिले अपने बारे मे सोचने का। अभी तो उठते ही उल्टी गिनती चालू हो जाती है, कार्यालय भागने की। सायं वापस आने के बाद, शरीर और बुद्धि विद्रोह कर देते हैं, व्यवस्थाओं से जूझने के बाद और समाज का नग्न स्वरूप का अवलोकन कर। यही क्या कम है कि रात में नींद आ जाती है, उस समय आत्मविकास का विचार व्यर्थता का चरम लगता है। रॉबिन शर्मा की पुस्तक पढ़ने में डर लगने लगा है, कहीं शब्द निकल कर पूँछ न बैठे कि सुबह 5 बजे उठना प्रारम्भ किया कि नहीं?
कुछ दिन पहले निशान्त ने स्टीवेन एटकिंसन का परिचय कराया, उनके ब्लॉग में जाकर देखा तो वही राग सुबह 5 बजे उठने का, पूरी की पूरी पुस्तक लिख डाली है सुबह उठने के लिये। पता नहीं उस पुस्तक में क्या होगा, पर मुझे तो ज्ञात है कि मैं यदि कोई पुस्तक लिखूँगा कि मैं सुबह क्यों नहीं उठ पाता हूँ तो संभवतः मन की क्रूरता के आस पास ही उसकी प्रस्तावना और उपसंहार होगा।
सुबह आँख खुलते ही मन आपसे कहता है कि आप बहुत थके हो, इतने परिश्रम के पश्चात शरीर को विश्राम चाहिये। आप सुन लेते हैं, आपको अच्छा लगता है यह सुनना, पहला ही तीर और आप ध्वस्त। यदि आप बच गये तो कहेगा कि आज कोई विशेष कार्य नहीं है, थोड़ा लेटे लेटे विचार कर लेते हैं, कोई नया विचार आ जायेगा। इस प्रकार एक के बाद आपसे अधिक मौलिक विचार श्रंखलाओं से आपको भरमाने का प्रयास चलता रहेगा। कितना बचेंगे, कब तक बचेंगे? जिस शरीर को 5 घंटे से अधिक की निद्रा नहीं चाहिये, मन बलात सुलाता रहता, लगभग डेढ़ गुना।
जीवन अब रातों में अधिक खिचने लगा है, तामसिकता बढ़ गयी है, अरुणीय मन्त्रों से अधिक रात्रि के गीत रस देने लगे हैं, घर की परम्परायें दम तोड़ रही हैं, पिताजी सुबह 5 बजे उठने वाले पुरातन ही रह गये, मैं रात को 1 बजे सोकर स्वयं को आधुनिक सिद्ध करने में प्रयासरत हूँ।
19 वर्ष पहले का एक दिन, वृन्दावन यात्रा, सुबह 4 बजे मित्र के साथ, कृष्ण मंदिर की मंगल आरती में। धुन और शब्द अभी भी स्मरण में स्पष्ट हैं।
विभावरी शेष, आलोक प्रवेश, निद्रा छोड़ी, उठो जीव…
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