चोला माटी के हे रे

by प्रवीण पाण्डेय

कुछ विषय ऐसे हैं जिनसे हम भागना चाहते हैं, इसलिये नहीं कि उसमें चिंतन की सम्भावना नहीं हैं या वे पूरी तरह व्यर्थ हैं। संभवतः भय इस बात का होता है कि उस पर विचार करने से हमारे उस विश्वास को चोट पहुँचेगी जिस पर हमारा पूरा का पूरा अस्तित्व टिका है। अस्तित्व स्वयं के होने का, विषय स्वयं के न होने का। जीवन की कार्य-श्रंखला जब यह मान कर तैयार हो रही हो कि हमारा अवसान होना ही नहीं है, अन्त शब्द का उच्चारण मौन उत्पन्न कर देता है, चिन्तन का मौन। यक्ष का आश्चर्य-प्रश्न, यदि कोई सोचने लगता है उस विषय पर तो उस व्यक्ति को आश्चर्य की वस्तु समझा जाता है। मूल विषयों से इस आश्चर्य-प्रश्न के संदर्भों को सरलता से भुला देता है हमारा स्मृति-तन्त्र।
नगीन तन्वीर
पीप्ली लाइव का एक गीत चोला माटी के हे रे एक ऐसा ही संदर्भ है जो हमें याद ही नहीं रहता है, उस फिल्म में प्रस्तुत भूख, गरीबी और मीडिया की उछलकूदों के सामने। फिल्म देखते समय यही स्मृति-लोप मेरे साथ भी हुआ। यदि इसका संगीत व गायिका नगीन तन्वीर के स्वर विशेष न होते तो संभवतः मैं भी इसे पुनः न सुनता, इसके बोलों को पढ़ने और समझने का प्रयत्न न करता। खड़ी बोली में न होने के कारण, अधिकांश शब्द एक बार में अर्थ नहीं स्पष्ट कर पाते हैं, बस उड़ता उड़ता सा संकेत देकर ही निकल जाते हैं।
यह चोला(शरीर) माटी का है। द्रोण जैसे गुरु, कर्ण जैसे दानी, बाली जैसे वीर और रावण जैसे अभिमानी, सब के सब यहाँ से प्रयाण कर गये। काल किसी को नहीं छोड़ता है, राजा, रंक और भिखारी, कोई भी हो, सबकी बारी आनी है। पगले, हरि का नाम स्मरण कर ले और भव सागर पार कर मुक्त हो जा।
यह दार्शनिक उच्चारण, किसी को भांग व चरस जैसा लगता है जो गरीबी, मजबूरी और अकर्मण्यता के कष्ट को भुला देता है, किसी को प्रथम प्रश्न सा लगता है जिसका उत्तर जीवन की दिशा निर्धारित करता है, किसी को कपोल-कल्पित व अनावश्यक लगता है जिसके बिना भी जीवन जीते हैं सब, किसी को बन्धनकारी लगता है जो हमें कितने ही अचिन्त्य कर्तव्यों के जाल में समेट लेता है।
भले दर्शन से अरुचि हो हमें पर प्रयाण हम सबको करना है, प्रायिकता के सिद्धान्त से जीवन उत्पत्ति के अनुयायियों को भी और ईश्वर की सत्ता के उपासकों को भी। चोला माटी का है, यह एक सत्य है हम सबके लिये। दर्शन-भिन्नता जीवन-शैली का निर्धारण कर देती है, चार्वाक से निष्काम कर्म तक सुविस्तृत फैली। कैसी भी हो जीवन शैली, इस अन्तिम तथ्य पर विचार किये बिना उसे तार्किक क्षेत्र में स्थापित कर पाना असम्भव है।
आसमां में उड़ने वाले मिट्टी में मिल जायेगा, इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल और चोला माटी के हे रे, ये सब गीत हमारा चिन्तन जहाँ पर स्थित कर देना चाहते हैं, वहाँ की ऊष्णता हमें क्यों विचलित कर देती है? धर्म की वीथियों से परे निकल, अपने अन्तरतम के विस्तृत मैदानों में इसका उत्तर पाने का यत्न करना ही है हमे।
गूढ़ प्रश्नों का उत्तर वस्तुनिष्ठ नहीं होता है, हमें खोजना पड़ता है सतत, बार बार मिलान कर देखना पड़ता है अपने जीवन से, बार बार कुछ भाग बदलने पड़ते हैं उस उत्तर के।
माटी का क्या मोल है? साथ ही साथ कौन सी ऐसी मूल्यवान वस्तु है जो माटी से न निकली हो? इन दो तथ्यों के बीच जीवन को स्थापित कर पाना सरल नहीं है। माटी से आकार ले, पुनः उसी में मिल जाने का सुख जनकसुता के एकांगी आत्मविश्वास का पर्याय भी है और असहायता का विकल स्वर भी।
क्या चुनना है और क्यों चुनना है, यह आप समझें अपने जीवन के लिये, कुछ उत्तर निसन्देह बदलेंगे आपके भी। मैं तो एक बार पुनः सुनने चला यह गीत, चोला माटी के हे रे।
कौन सा रहस्य पिरोया है उस अन्तिम आकर्षण में? अनुभवों की यात्रा का परम-विश्राम।

गाना सुन लें, मैने नहीं गाया है।
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