तानपुरा और जीवन

by प्रवीण पाण्डेय

तानपुरा
कभी तानपुरा देखा है? किसी भी संगीत समारोह में, मंच के दोनों ओर, पार्श्व में स्तंभ से खड़े दो वाद्य यन्त्र, साथ में चेहरे पर सपाट सा भाव लिये धीरे धीरे उस पर ऊँगलियाँ फिराते दो वादक। जब तबला, बाँसुरी, हारमोनियम, सरोद आदि वाद्य यन्त्र, सुर-ताल के साथ किये सफल प्रदर्शन का उत्साह एक दूसरे के साथ बाटते हैं, तानपुरे निस्पृह भाव से अपने कार्य में लगे रहते हैं। कभी भी तानपुरे के लिये तालियाँ बजते नहीं सुनी। कभी कभी तो लगता था कि परम्पराओं की बाध्यता में हमने मंच के दोनों ओर दो निर्जीव स्तम्भ खड़े कर रखे हैं, जिनके न होने पर मंचों का आकार कम किया जा सकता था। इस विषय में मेरा ज्ञानबोध अपूर्ण निकला, जब तानपुरे के बारे में जाना, कुछ अपनों सा लगा उसका भी जीवन।
सन्तोषजी की बाँसुरी

नव ज्ञानबोध का श्रेय जाता है, एक बहुत छोटी पर सरस, आत्मीय और साहित्यिक भेंट को, सन्तोषजी से। प्रतिष्ठित स्थानीय हिन्दी समाचार पत्र के उपसम्पादक हैं, ब्लॉग से जुड़े हैं, संगीत में गहरी रुचि है और मोहक बाँसुरी बजाते हैं। पहले तो उन्होने कुछ पुराने गीत सुनवाये, जो किसी कारणवश फिल्मों में नहीं आ पाये, एक रफी साहब का था, रात के तारों के ऊपर। बाँसुरी बजाने के अनुरोध को स्वीकार करते हुये उन्होने पहले एक इलेक्ट्रॉनिक तानपुरा निकाला, उसे संयोजित किया और तब सायं के दो राग सुनाये, राग यमन और राग भूपाली।

इलेक्ट्रॉनिक तानपुरा
इलेक्ट्रॉनिक तानपुरे ने उत्सुकता को एक नयी दिशा दे दी। यह उनके संगीत के लिये बंगलोर की देन थी। तानपुरे की उपयोगिता पर एक सारगर्भित चर्चा छेड़ते हुये उन्होने जो बताया, प्रयोगसहित, उसे यथावत प्रस्तुत कर रहा हूँ।
बाँसुरी में सुरों के आरोह व अवरोह के मध्य कहाँ पर आकर स्थिर होना है, इसके लिये एक ध्वनि-आधार आवश्यक होता है। वह न होने की स्थिति में स्वरों को भटकने से रोकना अत्यधिक कठिन हो जाता है। जिस आधार पर बाँसुरी बज रही थी, उस आधार पर तानपुरे का नॉब घुमाने पर वातावरण में एक अनुनाद का अनुभव हुआ जो संकेत था कि आप आधार पर वापस आ चुके हैं। यही सिद्धान्त गायकी में भी प्रयुक्त होता है। मुझसे भी उस आधार पर गाने के स्वर स्थिर करने को कहा गया, जब कानों में स्वर गूँजने लगा तब लगा कि यही संयोजन की स्थिति है। थोड़ा सा ऊपर व नीचे करने में कर्कशता उत्पन्न होती है और पता लग जाता है कि स्वरों से भटकाव हो गया है।
हम सबके व्यक्तित्व में एक तानपुरा बसता है, जो एक आधार बनाता है, एक दृष्टिकोण बनाता है, घटनाओं और व्यक्तित्वों को समझने का। उत्थान-पतन, लाभ-हानि आदि द्वन्दों से भरा है हम सबका जीवन पर इन सबके बीच जो विश्राम की निर्द्वन्द स्थिति आती है, वही हमारे तानपुरे की आवृत्ति है। व्यक्तिगत सम्बन्धों में उत्पन्न कर्कशता, जीवन को उन स्वरों में ले जाने के कारण होती है, जो औरों के व्यक्तित्व के तानपुरे के साथ संयोजित नहीं हो पाते हैं। परम्परा को नव विचार नहीं सुहाता, ऊर्जान्वित यौवन को शैथिल्य नहीं सुहाता, सब चाहते हैं कि विश्व के स्वर उनके तानपुरे की आवृत्ति में रहें। 
किसी व्यक्ति के लिये उसके संस्कार ही तानपुरा है, जीवन के सुर उसके ही आसपास घूमते हैं। किसी समाज के लिये उसकी संस्कृति और जनसामान्य की जीवनशैली ही तानपुरा है। किसी देश के लिये शान्ति, विकास और समृद्धि की आस ही तानपुरा है। अमेरिका की व्यक्तिगत कर्मशीलता, जापान का  पारिवारिक अनुशासन, भारत का सामाजिक अध्यात्म ऐसे ही तानपुरे हैं जिसका आधार ले वहाँ के जीवन-गीत निर्मित होते हैं। आप भारत में अमेरिका या अमेरिका में जापान के मूल्य नहीं खोज सकते।
आप माने न माने, आपका जीवन समाज के तानपुरे को बल देता है और उससे प्रभावित भी होता है। आपका हलचलविहीन जीवन भले ही आपको भला न लगे पर वह हर समय उस तानपुरे का सृजन कर रहा होता है जिसकी आवृत्ति पर आने वाली पीढ़ियाँ सुर मिलायेंगी। हमारे पूर्वज जिनका नाम इतिहास की पुस्तकों में नहीं है, हमारे वयोवृद्ध जो उत्पादकता के मानकों पर शून्य हैं, वे जनसामान्य जिनका जीवन विशेष की श्रेणी में नहीं आता है, सबने वह आधार निर्माण किये हैं  जिस पर हम अपने उत्थानों के स्वर सजाते रहते हैं।
अगली बार किसी समारोह में तानपुरों को देखें, स्तम्भवत, उमंगविहीन, तो मन में उनके प्रति अकर्मण्यता के भाव न लायें। वे आधार तैयार कर रहे हैं उन आवृत्तियों का जिन पर श्रेष्ठ मंचीय प्रदर्शन निर्भर करता है।
उन तानपुरों से कितना मिलता जुलता है, हम सबका जीवन।
Advertisements