आईटी की पीड़ा

by प्रवीण पाण्डेय

पिछले दो दशक अपनी उन्नति के गर्व में मदमाये खड़े हैं। आईटी ने विश्व को अपरिवर्तनीय दिशा दे दी है, अब चाह कर भी कोई पुरानी राहों पर लौटकर न जा पायेगा। बलात ही सही, सबको बढ़ना तो पड़ेगा ही। इस बदलाव को स्वप्नोत्तर प्रत्यक्ष रूप देने में भारतीय युवाओं की क्षमताओं और प्रयत्नों का विशेष योगदान रहा है। कूट भाषा में अपने आदेशों को लिखकर, उनके माध्यम से बड़े बड़े संयन्त्रों को चला लेने का सहज-कर्म प्रतिदिन विस्तार पा रहा है। नित नये क्षेत्र इस परिधि में सिमटते जा रहे हैं। जो व्यवसाय आईटी से दूर हैं, उन्हें प्रबन्ध-गुरु हेय दृष्टि से देख रहे हैं। जिस प्रकार रात में शारीरिक थकान को विश्राम मिलता है, अमेरिका की रातों में भारतीय प्रतिभायें कार्य कर उनका प्रभात विघ्नविहीन करने में लगी रहती हैं। व्यावसायिक उन्मत्तता ने रात-दिन के व पूर्व-पश्चिम के अन्तर को मिटा डालने की कसम सी खा ली है।
इस उद्देश्य के लिये पूरी की पूरी सेनाओं का गठन हो रहा है, विश्वविजय की रणभेरी रह रह कर सुनायी पड़ती है प्रतिदिन। बंगलोर इस विश्वविजयी अभियान का प्रमुख गढ़ है। इस क्षेत्र से सम्बन्धित कुछ अन्य तथ्यों को बंगलोर में रह कर ही समझ पाया हूँ। 15 वर्ष पहले आईटी को सिविल सेवा के लिये छोड़ देने से यह अनुभव प्रत्यक्ष नहीं रहा पर यदि इस क्षेत्र में रहता तो उस पीड़ा को और ढंग से व्यक्त कर पाता जिसके स्वर कभी इस नगर के बाहर नहीं निकल पाते हैं।
पहला तो नये प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षित करने में लगभग एक वर्ष का समय लगता है। दूसरा, अधिक पैसों के लिये कम्पनी छोड़कर आने जाने वालों की संख्या भी अधिक रहती है। तीसरा, किसी नये कार्य को प्राप्त करने के लिये और प्रथम दिन से ही उसका निष्पादन करने के लिये हर समय अतिरिक्त सॉफ्टवेयर इन्जीनियरों की संख्या रखनी पड़ती है। यह तीन कारक हैं किसी भी सॉफ्टवेयर कम्पनी में आवश्यकता से अधिक व्यक्ति होने के। अब इस स्थिति में, किसी भी समय लगभग 10% इन्जीनियरों के पास कोई भी कार्य नहीं रहता है। इसे बेन्च स्ट्रेन्थके नाम से भी जाना जाता है। कार्यालय उन्हे आना पड़ता है, बिना किसी कार्य के, कुछ भी आकर पढ़िये, कुछ भी आकर करिये। कुछ दिन ही ठीक लगता है यह हल्कापन। व्यस्तता के चरम से कुछ न कर पाने की यह स्थिति असहनीय मानसिक तनाव लाती है। मनोरोग और आध्यात्म के रूप में इस मानसिक तनाव की दिशा ढूढ़ते देखा है इन युवाओं को।
यहाँ सरकारी वेतनमानों से बहुत अलग, वेतन प्रदर्शन पर निर्भर होता है। सॉफ्टवेयर कम्पनियों का वैश्विक स्वरूप विदेशों में कार्य करने के कई अवसर भी देता है। एक होड़ सी मची रहती है बाहर जाने की, गलाकाट प्रतियोगिता आगे निकलने के लिये। 24 घंटे कार्य करने की लगन और स्वास्थ्य व परिवार को भुलाकर कम्प्यूटरीय भाषा में डूबे रहने का क्रम और असाधारण व्यक्तित्वों को निर्मित करती यह जीवन शैली।
वेतन बहुत अधिक होने से घर, गाड़ी, धन आदि जीवन के अवयव 35 वर्ष का होते होते आ जाते हैं। अब कोई क्या करे, और धनार्जन? सरकारी सेवाओं में रिटायरमेन्ट का अर्थ होता है, इतना धन जिससे जीवन के इन अवयवों का अर्जन हो सके। अब 35 वर्ष के बाद क्या करे सॉफ्टवेयर इन्जीनियर? यहाँ से कई राहें निकलती देखी हैं। प्रतिभावान प्रोग्रामर सॉफ्टवेयर के निर्माण के किसी विशेष अंग के आधार पर अपनी अलग कम्पनी खोल लेते हैं, अपनी कम्पनी के स्वामी। प्रतिभावान प्रबन्धक अपने अर्जित धन से नया व्यवसाय डाल देते हैं। शेष सॉफ्टवेयर निर्माण के कार्य में यथावत लगे रहते हैं, बिना किसी विशेष प्रेरणा के। जीवन को गति में जीने की लत, एक अवस्था के बाद रिक्तता उत्पन्न करने लगती है विचारों में।
पीड़ा के स्वर, भले ही प्रगति के महानाद में छिप जायें, भले ही धन की अधिकता में विलीन से हो जायें हैं और भले ही कूट भाषा की शक्ति के मद में अनुभव न हों, पर हैं यथार्थ। उसे झेलकर देश की गरिमा को उन्नत करने में लगे युवा हमारे अपने हैं। हम भी इसे समझें और इस व्यवसाय से जुड़े अपने परिचितों और सम्बन्धियों को वह मानसिक दृढ़ता प्रदान करें जिसकी स्पष्ट माँग वे हमसे नहीं करते हैं।
Advertisements