मायके जाने का सुख

by प्रवीण पाण्डेय

आप पढ़ना प्रारम्भ करें, उसके पहले ही मैं आपको पूर्वाग्रह से मुक्त कर देना चाहता हूँ। आप इसमें अपनी कथा ढूढ़ने का प्रयास न करें और मेरे सुखों की संवेदनाओं को पूर्ण रस लेकर पढ़ें। किसी भी प्रकार की परिस्थितिजन्य समानता संयोगमात्र ही है।
मायके जाना एक सामाजिक सत्य है और एक वर्ष में बार बार जाना उस सत्य की प्राण प्रतिष्ठा। पति महत्वपूर्ण है पर बिना मायके जाये सब अपूर्ण है। कहते हैं वियोगी श्रंगार रस, संयोगी श्रंगार रस से अधिक रसदायक होता है, बस इस सत्य को रह रह कर सिद्ध करने का प्रयास भर है, मायके जाना। कृष्ण के द्वारिका चले जाने का बदला सारी नारियाँ कलियुग में इस रूप में और इस मात्रा में लेंगी, यदि इसका जरा भी भान होता तो कृष्ण दयावश गोकुल में ही बस गये होते। अब जो बीत गयी, सो बीत गयी।
पुरुष हृदय कठोर होता है, नारी मन कोमल। यह सीधा सा तथ्य हमारे पूर्वज सोच लिये होते तो कभी भी उल्टे नियम नहीं बनाते और तब विवाह के पश्चात लड़के को लड़की के घर रहना पड़ता। तब मायके जाने की समस्या भी कम होती, वर्ष में बस एक बार जाने से काम चल जाता और बार बार नये बहाने बनाने में बुद्धि भी नहीं लगानी पड़ती। अपने घर में बिटिया को मान मिलता और दहेज की समस्या भी नहीं होती। लड़की को भी नये घर के सबके स्वादानुसार खाना बनाना न सीखना पड़ता। यदि खाना बनाना भी न आता तब भी कोई समस्या नहीं थी, माँ और बहनें तो होती ही सहयोग के लिये हैं। सास-बहू की खटपट के कितने ही दुखद अध्याय लिखे जाने से बच जाते। कोई बात नहीं, ऐतिहासिक भूलें कैसी भी हो, अब परम्परायें बन चुकी हैं, निर्वाह तो करना ही पड़ेगा।
विवाह करते समय यह आवश्यक है कि लड़की कोई न कोई पढ़ाई करती रहे, अपने मायके के विश्वविद्यालय में। इससे जब कभी भी मन हो, मायके आने की स्वतन्त्रता और अवसर मिलता रहेगा, पढ़ाई जैसा महत्वपूर्ण विषय जो है। विवाह के बाद मायके पक्ष के अन्य सम्बन्ध और प्रगाढ़ हो जाते हैं। चचेरे-ममेरे-मौसेरे रिश्तों की तीन-चार पर्तें जीवन्त हो जाती हैं, बिना उनके उत्सवों में जाये काम नहीं चलेगा, चाहे अन्नप्राशन ही क्यों न हो। विवाह आदि महत उत्सवों के चारों अवसरों पर जाना बनता है, कहीं बुरा मान गये तो।
  
बच्चे आदि होने के बाद, उनके पालन सम्बन्धी विषयों पर विशेष सलाह लेने का क्रम मायके जाने का योग बनाता रहता है। दो बच्चों में लगभग 7 वर्ष इस प्रकार निकल जाते हैं। अब इतनी बार आने जाने में बच्चों को भी नानी का घर सुहाने लगता है, मान लिया आपकी तो इच्छा नहीं है पर बच्चों का क्या करें, उनके लिये ही चले जाते हैं।
इस दौड़ धूप से थोड़ी बहुत स्थिरता यदि मिल पाती है तो उसमें विद्यालयों के अनुशासन का विशेष योगदान है। यदि उपस्थिति का इतना महत्व न दिया जाता तो मायके में एक ट्यूटर रख बच्चों की पढ़ाई की भरपाई तो की ही जा सकती थी। छुट्टियाँ होने के तीन दिन पहले से ही पैकिंग प्रारम्भ हो जाती है जिससे कि बिना समय व्यर्थ किये हुये प्रस्थान किया जा सके और अधिकतम समय ननिहाल में मिल सके बच्चों को।
मायके के संदर्भों में बुद्धि को कल्पना के विस्तृत आयाम मिल ही जाते हैं, जहाँ चाह, वहाँ राह। श्रीमतीजी की बुद्धि का विकास और पति की तपस्या, यह दो सुदृढ़ पहलू हैं, मायकेगमन के।

पहले दिन से ही भटकन, सब प्रकार की। क्या कहाँ रख कर चली गयी हैं? इसी बहाने मोबाइल पर कई बार बात होने से संवाद जैसी स्थिति बनी रहती है और यह संदेश भी जाता है कि बिना आपके जीवन कितना कठिन है। सतीश पंचम जी की खाना बनाने की व्यथा और होटलों में जाकर खाने का क्रम, तपस्या को चिन्तनप्रधान बना देते हैं। पहले तो टेलीविजन देखने को ही नहीं मिलता था, अब यह समझ में नहीं आता है कि क्या देखें, क्या न देखें? सास-बहूनुमा कथा-भँवरों से बाहर भी टेलीविजन की सार्थकता है, केवल इसी समय समझा और देखा जा सकता है।

समय की उपलब्धता और निरीक्षणों की अधिकता में प्रशासनिक कार्य गति पकड़ लेता है, आत्मसंतुष्टि का एक और अध्याय। लम्बी यात्राओं में नये विचार और लेखन, फलस्वरूप यह पोस्ट।
पोस्ट की पूर्वतरंगों से करुणामयी हो, श्रीमतीजी 20 दिन के स्थान पर 15 दिनों में ही वापस आ गयी हैं, कल, वर्ष के अन्तिम क्षणों में। मायके जाने के सुख को पुनः एक बार विश्राम और अगले एक वर्ष तक मायके न जाने के वचन जैसी कुछ उद्घोषणा। “कोई मैके को दे दो संदेश, पिया का घर प्यारा लगे।” 
अब यह पोस्ट डालने की इच्छा तो नहीं रही पर जब लिख ही ली है तो सुख बाँट लेते हैं। 
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