करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी

by प्रवीण पाण्डेय

आओ तुम जीवन प्रांगण में,
छाओ बन आह्लाद हृदय में,
उत्सुक है मन, बाट जोहता,
नहीं अकेले जगत सोहता,
तृषा पूर्ण, हैं रिक्तिक यादें,
आशान्वित बस समय बिता दें,
टूटेगी सुनसान उदासी,
करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी ।1।
अलसायी, झपकी, नम पलकें,
प्रेमजनित मधु छलछल छलके,
स्वप्नचित्त, अधसोयी, हँसती,
जाने किस आकर्षणरस की,
स्रोत बनी, कर ओतप्रोत मन,
शमन नहीं हो सकने का क्रम,
रहरह फिर आत्मा अकुलाती,
करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी ।2।
कोमल, कमल सरीखी आँखें,
प्रेमपंक, उतराते जाते,
आश्रय बिन आधार अवस्थित,
मूक बने खिंचते, आकर्षित,
कहाँ दृष्टिसंचार समझते,
नैन क्षितिजवत तकतेतकते,
जाने कितनी रैन बिता दी,
करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी ।3।
सुप्तप्राय मन, व्यथा विरह की,
किन्तु लगा मैं अनायास ही,
आमन्त्रित यादों में रमने,
स्वप्नों के महके उपवन में,
आँखों में आकर्ष भरे तुम,
यौवन चंचल रूप धरे तुम,
बाँह पसारे पास बुलाती,
करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी ।4।
प्रात, निशा सब शान्त खड़े हैं,
आशाओं में बीत गये हैं,
देखो जीवन के कितने दिन,
मेघ नहीं क्यों बरसे रिमझिम,
आगन्तुक बनसुख सावन में,
इस याचक का मान बढ़ाने,
आती तुम, अमृत बरसाती,
करूँ प्रतीक्षा, आँखें प्यासी ।5।


विवाह निश्चित होने के कुछ दिनों बाद ही यह कविता फूटी थी और अभी भी अधरों पर आ जाती है, गुनगुनाती हुयी, स्मृतियाँ लिये हुये। हाँ, आज विवाह को 12 वर्ष भी हो गये।

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