समरकन्द

by प्रवीण पाण्डेय

आप सरस साहित्यिक हैं या घनघोर असाहित्यिक हैं, इससे आपके ससुराल पक्ष को कोई अन्तर नहीं पड़ता है। समस्या तब होती है जब उनकी पुत्री को आपकी साहित्यिक अभिरुचियों से व्यवधान होने लगता है। आभूषणग्रस्त भारतीय नारियों के लिये पति का साहित्याभूषण पहन लेना जहाँ एक ओर अभिरुचियों की समानता के रूप में भी देखा जा सकता है वहीं दूसरी ओर आभूषणों के ऊपर एकाधिकार हनन के रूप में भी। साहित्य के प्रति प्रदर्शित प्रेम और व्यतीत किया हुआ समय कई ब्लॉगरों के लिये संवेदनात्मक झड़पें लाता रहा है।

हमें समय दे दिया जाता है, ब्लॉगिंग के लिये, बिना किसी विवशताओं के। अतः अभी तक हमारे साहित्यिक झुकाव को लेकर ससुराल पक्ष से कोई स्वर नहीं उभरा।

पहला संवेदी स्वर तब उठा जब रवीश जी ने हमारे ब्लॉग को अपने स्तम्भ में स्थान देने की महत कृपा की। दैनिक हिन्दुस्तान में पढ़ी यह बात हमारे श्यालों तक भी पहुँची। फोन आया और पहला प्रश्न था कि यह तो राष्ट्रीय स्तर पर आपका नाम आया है। हाँ, बात छिपाने का कोई लाभ नहीं था। तब तो बहुत बड़ी पार्टी बनती है। ठीक है, सुबह पाबला जी को भी पार्टी का वचन दिया था अतः अब उसके लिये पीछे हटने का प्रश्न नहीं था। मान गये और होटल व समय निश्चित करने के लिये कह दिया।

SK1सायं श्रीमान भाईसाहब अपनी बहन के साथ तैयार थे, चलने के लिये। होटल का नाम था समरकंद। पहले तो समझ में नहीं आया कि उजबेकिस्तान की राजधानी और सिल्क रोड के महत्वपूर्ण नगर का बंगलुरु में क्या औचित्य। जब अन्दर पहुँचे तब नामकरण का कारण समझ में आया। लकड़ी के कटे दरख्तों के आकार की मेजें, बाँस और लकड़ी के पट्टों से बनी कुर्सियाँ, पुराने गाँवों के घरों की तरह पोती गयी दीवारें, पुराने नक्काशीदार काँसे के बर्तन, अखबार की खबर जैसा मेनू, पश्तूनी पोशाक में वेटर। हाथ में यदि मोबाइल फोन न होता तो हम यह भी भूल गये होते कि हम किस कालखण्ड में जी रहे हैं।

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SK2वातावरणीय आवरण से उबरे तो सारा भोजन भी विशुद्ध उजबेकी स्वरूप लिये था। घोंटी हुयी दाल, रोटियों का थाल, अलग ही स्वाद लिये छौंकी हुयी सब्जियाँ, विभिन्न प्रकार की चटनियाँ, सब कुछ न कुछ विशेष था। बच्चों को भी यह नयापन भा रहा था। भोजन न केवल स्वादिष्ट था वरन सन्तुष्टिदायक भी था। मन समरकंद के मानसिक धरातल पर विचरण कर रहा था।
प्रवाह अवरुद्ध तब हुआ जब बिल आया। बिल आते ही हम बंगलुरु वापस आ चुके थे। कितना हुआ यह मत पूछियेगा, बस प्रसन्नचित्त मुद्रा में प्रसिद्धि का प्रथम मूल्य चुका कर हम बाहर आ गये। वापस घर आने की तैयारी कर ही रहे थे कि बच्चे अपने मामा के साथ एक आइसक्रीम की दुकान में मुड़ गये। वनीला आइसक्रीम में फलों और सूखे मेवों की कतरनें और उस पर गर्म चॉकलेट उड़ेल दी गयी, नाम था डेथ बाइ चॉकलेट। डरते डरते खा गये, कुछ नहीं हुआ।

हमारे साथ जो कुछ भी हुआ, ईश्वर करे सबके साथ हो। ससुराल आपकी साहित्य साधना को इतना मूल्यवान कर दे कि आपको मुझसे और मेरे साहित्यप्रेम से और भी अधिक संवेदना होने लगे। कल आपका भी नाम रवीश जी निकालें और आपके ससुराल वाले भी आपको समरकन्द की यात्रा पर ले जायें।

पूरे प्रकरण में बस एक ही लाभ हुआ कि श्याले महोदय ने अब हमारे ब्लॉग पर दृष्टि रखनी प्रारम्भ कर दी है।
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