मा पलायनम्

by प्रवीण पाण्डेय

दोपहर के बाद कार्यालय में अधिक कार्य नहीं था अतः निरीक्षण करने निकल गया, टिकट चेकिंग पर। बाहर निकलते रहने से सम्पूर्ण कार्यपरिवेश का व्यवहारिक ज्ञान बना रहता है। सयत्न आप भले ही कुछ न करें पर स्वयं ही कमियाँ दिख जाती हैं और देर सबेर व्यवस्थित भी हो जाती हैं। पैसेंजर ट्रेन में दल बल के साथ चढ़ने से कोई भगदड़ जैसी नहीं मचती है यहाँ, सब यथासम्भव टिकट लेकर चढ़ते हैं। उत्तर भारत में अंग्रेजों से लड़ने का नशा अभी उतरा नहीं है। अब उनके प्रतीकों से लड़ने के क्रम में बहुत से साहसी युवा व स्वयंसिद्ध क्रान्तिकारी ट्रेन का टिकट नहीं लेते हैं। दक्षिण भारत में यह संख्या बहुत कम है अतः टिकट चेकिंग अभियान बड़े शान्तिपूर्वक निपट जाते हैं।

बिना टिकट यात्री पूरा प्रयास अवश्य करते हैं कि वे आपकी बात किसी ऊँचे पहुँच वाले अपने परिचित से करा दें अतः पकड़े जाने के तुरन्त बाद  ही मोबाइल पर व्यग्रता से ऊँगलियाँ चलाने लगते हैं, यद्यपि लगभग हर समय वे प्रयास निष्प्रभावी ही रहते हैं। दूर से 13-14 साल के दो बच्चों को देखता हूँ, अपने विद्यालय की ड्रेस मे, पकड़े जाने के बाद भी चुपचाप से खड़े हुये। कुछ खटकता है, अगले स्टेशन पर अपने साथ उन्हें भी उतार लेने को कह देता हूँ। हमारे मुख्य टिकट निरीक्षक श्री अकबर, अनुभव के आधार पर बच्चों से दो तीन प्रश्न पूछने के बाद, उनसे उनके अभिभावकों का फोन नम्बर माँगते हैं। फोन नम्बर देने में थोड़ी ना नुकुर के बाद जब अभिभावकों से बात होती है तो अभिभावक दौड़े आते हैं और जो बताते हैं वह हम सबके लिये एक कड़वा सत्य है।

दोनों बच्चों के पिछली परीक्षा में कम अंक आने से घर में डाँट पड़ती है। घर की डाँट और विद्यालय के प्रतियोगी वातावरण से क्षुब्ध बच्चे इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि उन्हें न विद्यालय समझ पा रहा है और न ही घर वाले। दोनों बच्चे आपस में बात करते हैं जिससे उनकी क्षुब्ध मनःस्थिति गहराने लगती है। परिस्थितियों का कोई निष्कर्ष न आते देख दोनों भाग जाने का निश्चय करते हैं। शिमोगा भागने की योजना थी, वहाँ जाकर क्या करना था उसका निश्चय नहीं किया था। अन्ततः उनके अभिवावकों को समझा दिया जाता है, उन्हे भी अपनी भूल का भान होता है।

मैं घर आ जाता हूँ और धन्यवाद देता हूँ ईश्वर को कि मेरे हाथों एक पुण्य करा दिया।
Srressedपर क्यों कोई बच्चा अपने परिवेश से क्षुब्ध हो? जो पढ़ाई का बोझ सह नहीं पाते हैं, क्यों सब कुछ छोड़ भागने को विवश हों? क्या इतना पढ़ाना ठीक है जिसका जीवन में कोई उपयोग ही न हो? शिक्षा पद्धति घुड़दौड़ बना कर रख दी गयी है, जो दौड़ नहीं सकते हैं उसमें जीवन से भाग जाने का सोचने लगते हैं। ग्रन्थीय पाठ्यक्रम पढ़कर जीवन में उसका कुछ उपयोग न होते देख, सारा का सारा शिक्षातन्त्र व्यर्थ का धुआँ छोड़ता इंजिन जैसा लगने लगता है, कोई गति नहीं।

रटने के बाद उसे परीक्षाओं में उगल देना श्रेष्ठता के पारम्परिक मानक हो सकते हैं पर इतिहास में विचारकों ने इस तथ्य को घातक बताया है। उद्देश्य ज्ञानार्जन हो, अंकार्जन न हो। रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्वभारती इसका एक प्रयास मात्र था। चेन्नई में किड्स सेन्ट्रल और उसके जैसे अन्य कई विद्यालय हैं, जो बच्चों के लिये तनावरहित और समग्र शिक्षा के पक्षधर हैं और वह भी व्यवहारिक ज्ञान और प्रफुल्लित वातावरण के माध्यम से। बच्चों के लिये विशेषकर पर सम्पूर्ण शिक्षा पद्धति  के यही गुण हों, समग्रता, व्यवहारिकता, ऊर्जा और मौलिकता।

अभिभावक यह तथ्य समझें और विद्यालय इसको कार्यान्वित करें। बच्चों का बचपन व भविष्य हम सबकी धरोहर है। जीवन जीने के लिये है, पलायन के लिये नहीं।

मा पलायनम्।



चित्र साभार –  http://www.parent24.com/
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