भाषायी उत्पात और अंग्रेजी बंदर

by प्रवीण पाण्डेय

Vishwanath in 2008
श्री विश्वनाथजी
पूर्वज तमिलनाडु से केरल गये, पिता महाराष्ट्र में, शिक्षा राजस्थान में, नौकरी पहले बिहार में शेष कर्नाटक में, निजी व्यवसाय अंग्रेजी में और ब्लॉगिंग हिन्दी में। पालक्काड तमिल, मलयालम, मराठी, कन्नड, हिन्दी और अंग्रेजी। कोई पहेली नहीं है पर आश्चर्य अवश्य है। आप सब उन्हें जानते भी हैं, श्री विश्वनाथजी। जहाँ भाषायी समस्या पर कोई भी चर्चा मात्र दस मिनट में धुँआ छोड़ देती हो, इस व्यक्तित्व को आप क्या नाम देंगे? निश्चय ही भारतीयता कहेंगे।

पर कितने भारतीय ऐसे हैं, जो स्वतः ही श्री विश्वनाथजी जैसे भाषाविद बनना चाहेंगे? बिना परिस्थितियों के संभवतः कोई भी नहीं। दूसरी भाषा भी जबरिया सिखायी जाती है हम सबको। जब इस भारतीयता के भाषायी स्वरूप को काढ़ा बनाकर पिलाने की तैयारी की जाती है, आरोपित भाषा नीति के माध्यम से, देश के अधिनायकों द्वारा, राजनैतिक दल बन जाते हैं, विष वमन प्रारम्भ हो जाता है, भाषायी उत्पात मचता है और पूरी रोटी हजम कर जाता है, अंग्रेजी बंदर।

पिछले एक वर्ष से कन्नड़ सीख रहा हूँ, गति बहुत धीमी है, कारण अंग्रेजी का पूर्व ज्ञान। दो दिन पहले बाल कटवाने गया था, एक युवक जो 2 माह पूर्व फैजाबाद से वहाँ आया था, कामचलाऊ कन्नड़ बोल रहा था। वहीं दूसरी ओर एक स्थानीय युवक जिसने मेरे बाल काटे, समझने योग्य हिन्दी में मुझसे बतिया रहा था।

कार्यालय में प्रशासनिक कार्य तो अंग्रेजी में निपटाना पड़ता है पर आगन्तुक स्थानीय निवासियों से दो शब्द कन्नड़ के बोलते ही जो भाषायी और भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित होता है, समस्याओं के समाधान में संजीवनी का कार्य करता है। अंग्रेजी में वह आत्मीयता कहाँ? सार्वजनिक सभाओं में मंत्री जी के व अन्य भाषणों में केवल शब्दों को पकड़ता हूँ, पूरा भाव स्पष्ट सा बिछ जाता है मस्तिष्क-पटल पर। एक प्रशासनिक सेवा के मित्र ने मेरी इस योग्यता की व्याख्या करते हुये बताया कि कन्नड़ और संस्कृत में लगभग 85% समानता है, कहीं कोई शब्द न सूझे तो संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग कर दें। किया भी, नीर, औषधि आदि।

तेजाब फिल्म के एक गाने एक दो तीन चार….ने पूरे दक्षिण भारत को 13 तक की गिनती सिखा दी। अमिताभ बच्चन की फिल्मों का चाव यहाँ सर चढ़कर बोलता है। यहाँ के मुस्लिमों की दक्खिणी हिन्दी बहुत लाभदायक होती है, नवागुन्तकों को। भाषायी वृक्ष भावानात्मक सम्बन्धों से पल्लवित होते दिखा हर ओर, धीरे धीरे। इस वृक्ष को पल्लवित होते रहने दें, बिना किसी सरकारी आरोपण के, भाषायी फल मधुरतम खिलेंगे।

प्रश्न उठता है कि तब प्रशासनिक कार्य कैसे होंगे, विज्ञान कैसे बढ़ेगा? आईये गूगल का उदाहरण देखें, हर भाषा को समाहित कर रखा है अपने में, किसी भी साइट को आप अपनी भाषा में देख सकते हैं, भले ही टूटी फूटी क्यों न हो, अर्थ संप्रेषण तो हो ही जाता है। राज्यों को अपना सारा राजकीय कार्य स्थानीय भाषा में ही करने दिया जाये। इससे आमजन की पहुँच और विश्वास, दोनों ही बढ़ेगा, प्रशासन पर। प्रादेशिक सम्बन्धों के विषय जो कि कुल कार्य का 5% भी नहीं होता है, या तो कम्प्यूटरीकरण से अनुवाद कर किया जाये या अनुवादकों की सहायता से। तकनीक उपस्थित है तो जनमानस पर अंग्रेजी या अन्य किसी भाषा का बोझ क्यों लादा जाये।

Languages
यही हो हमारा माध्यम
त्रिभाषायी समाधान का बौद्धिक अन्धापन, बच्चों पर लादी गयी अब तक की क्रूरतम विधा होगी। भाषा का माध्यम स्थानीय हो, सारा ज्ञान उसमें ही दिया जाये। अपने बच्चों को हिन्दी अंग्रेजी अनुवाद के दलदल में नित्य जूझते देखता हूँ तो कल्पना करता हूँ कि विषयों के मौलिक ज्ञान के समतल में कब तक आ पायेगें देश के कर्णधार। विश्व का ज्ञान उसके अंग्रेजी अर्थ तक सिमट कर रह गया है। एक बार समझ विकसित होने पर आवश्यकतानुसार अंग्रेजी सहित किसी भी भाषा का ज्ञान दिया जा सकता है। भविष्य में आवश्यकता उसकी भी नहीं पड़नी चाहिये यदि हम मात्र वैज्ञानिक शब्दकोष ही सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा संस्कृत में विकसित कर लें।

भाषायी उत्पात पर व्यर्थ हुयी ऊर्जा को देश के विकास व अपनी भाषायी संस्कृति हेतु तो बचाकर रखना ही होगा। 


भाषा है तो हम हैं।
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