नगर भ्रमण

by प्रवीण पाण्डेय

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छोटे नगरों का चरित्र भी उस एक अकेली सड़क जैसा सम्यक होता है जिसके किनारे वह बसा होता है। छोटा नगर, सीमित आवश्यकताये, सरल जीवन शैली। एक सड़क पकड़ लीजिये, बायें या दायें मुड़ जाईये और पहुँच गये आप अपने गन्तव्य तक। बड़े नगर में सड़कों का जाल बिछा रहता है और उसी से मेल खाता जीवन और अनुभवों का उलझाव।

बंगलोर जैसे बड़े नगर में एक छोर से दूसरे छोर पहुँचने में दो घंटे  तक का समय लग जाता है। वैसे तो मुख्य सड़क से ही चलना श्रेयस्कर होता है, आप रास्ता नहीं भूल सकते हैं। जब मुख्य सड़कें रास्ता न भूलने वालों से भर जाती हैं और पूरा यातायात कछुये की गति पकड़ लेता है तब उन मुख्य सड़कों को जोड़ने वाली उपसड़कें बहुत काम आती हैं। सड़क-जाल के ज्ञाता ड्राइवर उस समय अपना प्रवाह उपसड़कों पर मोड़ लेते हैं और नगरीय चक्रव्यूह भेदते हुये गन्तव्य तक पहुँच जाते हैं। सभी मुख्य सड़कें एक-मार्गी हैं पर उपसड़कें द्विमार्गी हैं।

हमारे ड्राइवर महोदय जब वाहन चलाते हैं तो उनके मन में कितनी गणनायें चलती रहती हैं, इसका अनुमान नहीं होता है हमें। सामने का धीरे बढ़ता यातायात, अगला यातायात सिग्नल कहाँ आयेगा, पहली वह सड़क जहाँ से मुड़ा जा सकता है उपसड़कों पर, एक-मार्गी रास्तों का ज्ञान और मस्तिष्क में बसा पूरे बंगलोर का मानचित्र, इन सबके सुसंयोग ने कभी विलम्बित नहीं होने दिया हमें, अभी तक।

121416एक बार जब न रहा गया तो हम पूछ बैठे कि इतने रास्ते कैसे याद रह पाते हैं, इतने बड़े बंगलोर में। जो वाहन अधिक चलाते हैं, उनके उत्तर भिन्न हो सकते हैं पर यह उत्तर वैज्ञानिक लगा। मोड़ पर बने भवनों का एक चित्र सा बना रहता है मन में, उसी से दिशा मिलती रहती है। किन्ही और चिन्हों की आवश्यकता ही नहीं है। बहुत समय तक तो यह विधि सुचारु चली पर पिछले कुछ वर्षों से समस्या आ रही है। कारण उन कोनों के भवनों का पूर्ण कायाकल्प या उनके स्थान पर किसी और ऊँचे भवन का निर्माण हो जाना है। जिस गति से बंगलोर का विकास या निर्माण कार्य हो रहा है, यह भ्रम संभव है।

बहुत दिनों के बाद वाहन-कला का एक और गुण समझ में आया कि उस रास्ते से तीव्रतम पहुँचा जा सकता है जिस पर कम से कम यातायात सिग्नल मिलें। कैसे यातायात सिग्नलों को छकाते हुये, उपसड़कों में घूमा जा सकता है, यह बड़ा रुचिकर प्रकल्प हो सकता है।

कभी कभी जब यातायात धीरे धीरे बढ़ता है और उपसड़कों की सम्भावना भी नहीं रहती है तो किस प्रकार से विभिन्न लेन बदलकर बहुमूल्य एक घंटा बचाया जा सकता है, यह कर दिखाना भी एक कला है। इस कलाकारी से कई बार समय बचा कर सार्थक कार्यों में लगाया गया है।

गाने चलते रहते हैं, कभी किशोर, कभी मुकेश, कभी रफी या कभी नये। अवलोकन के क्रम को थोड़ा विश्राम मिल जाता है संगीत से।

छोटे नगर के भ्रमण में भला कहाँ से मिल पायेगा इतना अनुभव। नगर भ्रमण जब एक पोस्ट में नहीं सिमट पाया तो अन्य अनुभव तो अध्यायवत हो जायेंगे बड़े नगरों में।

चित्र साभार –
http://howyoudoin.wordpress.com/
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