अब अपने कपड़े धोना है

by प्रवीण पाण्डेय

किसी से आपको अपने शारीरिक बल की तुलना करनी है, उसके द्वारा निचोड़े कपड़े को निचोड़ें, यदि कुछ जल निकले तो जान लीजिये कि आपका बल अधिक है। बचपन में यह एक साधन रहता था खेल का और बल नापने का। कुछ दिन पहले पुत्र महोदय को हमसे शक्ति प्रदर्शन की सूझी तो यह प्रकरण याद आया, साथ ही यह भी याद आया कि पहले अपने कपड़े हम स्वयं ही धोते थे।

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यही सुखा कर पहनना है

स्वयं नहाना सीखने के कुछ दिन बाद ही हाथ में पहलवान साबुन हुआ करता था और अपने छोटे वस्त्रों को धोने का उत्तरदायित्व भी। नहाने के पहले बनियाइन, शर्ट, हॉफ पैण्ट और नहाने के बाद शेष वस्त्र। हाथों का व्यायाम, शीतल जल से स्नान और अन्त में बल परीक्षण। वस्त्र भी इतना प्यार पा प्रसन्न, उसी दिन सूख कर अगले दिन शरीर ढक लेने को प्रस्तुत। दो जोड़ी वस्त्रों में कटता, बढ़ता जीवन। अतिरिक्त वस्त्र वर्षा या अन्य अवसरों में ही प्रयोग में आ पाते थे।

छात्रावास में सारे कपड़ों को बाहर से धुलवाने की सुविधा थी पर धुलाई का पैसा बचाने के लिये, कम वस्त्रों से काम चलाने के लिये और शरीर का स्वास्थ्य बनाने के लिये कपड़ों से हमारा आत्मीय सम्बन्ध बना रहा। चद्दरें ही दी जाती थीं धुलने के लिये पर यदि रौ में आ जाते तो किसी रविवार को उनको भी धो डालने का उत्साह था हम लोगों में। हम मित्रों के लिये कपड़े धोते धोते लन्तरानी मारने का समय सबसे आनन्द देने वाला होता था, वहाँ अनुशासन की बयार नहीं पहुँच पाती थी। आई आई टी में भी हम अपनी मस्ती में अपने कपड़े धोते रहे, किसी उपसंस्कृति में बहे बिना।

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इन्होने की आत्मीयता अपहृत

विवाह कुछ पाने और बहुत कुछ खो जाने का नाम है। जहाँ एक ओर कपड़ों के प्रति हमारी आत्मीयता का गला घोंट कर उसे वाशिंग मशीन में डाल दिया गया वहीं दूसरी ओर रहा सहा समय नौकरी खा गयी। व्यस्तता और सुख के नाम पर उन लघु-विनोदों की तिलांजलि दे बैठे हम। अब तो वॉशिंग मशीन के अन्दर, कभी हमारे हाथों का स्नेह-स्पर्श पाये कपड़े, अनमने से धुलते और निचुड़ते रहते हैं। कपड़े की संख्या बढ़ जाने से, उनके प्रति रही सही आत्मीयता भी बँट गयी।

बंगलोर में अब कपड़ों की धुलाई एक बहुत बड़ा व्यवसाय बन चुका है। स्वयं अपने हाथों से धोने की बात तो दूर, आई टी के महाशयों के पास इतना भी समय नहीं है कि वाशिंग मशीन में ही धोकर प्रेस कर लें। सुबह पति देव निकलते हैं, पत्नी, बच्चे, कपड़े और समान की सूची लेकर। सबको एक एक कर छोड़ते हुये और सायं पुनः सबको एक एक कर लेते हुये।

बंगलोर में कार्यरत विलेज लॉन्ड्री सर्विस के सर्वेसर्वा और भारतीय प्रबंधन संस्थान से निकले श्री अक्षय मेहरा से जब इस क्षेत्र की संभावनायें सुनी तो गांधी और विनोबा जैसे नेताओं को न पालन करने वाले महान जन समूह की शक्ति और उस पर आधारित अर्थतन्त्र का आभास हुआ। वर्धा के आश्रमों की अपना कार्य स्वयं करने की परम्परा बंगलोर में ढहती दिखी।

अभी कुछ दिन पहले रेलवे के कार्य से एक कपड़े धोने वाली कम्पनी में गया, अन्तर्राष्ट्रीय मानकों और गुणवत्ता को पछाड़ती उस कम्पनी में एक शर्ट की धुलाई 200 रु में होती है। मेरे बचपन का कार्य जब इतना मँहगा हो गया है तो सोचता हूँ कि अपने कपड़े अब ढंग से धोऊँ अन्तर्राष्ट्रीय मानकों से और अपने शारीरिक और आर्थिक स्वास्थ्य को एक और अवसर प्रदान करूँ।

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