वर्धति सर्वम् स वर्धा – 1

by प्रवीण पाण्डेय

गांधीजी, विनोबा भावे और हिन्दी, इन तीनों का प्रेम मेरे आलस्य पर विजय पा चुका था, जब मैंने स्वयं को वर्धा हिन्दी विश्वविद्यालय के सभागार में खड़ा पाया। परिचय की प्रक्रिया में सारे ब्लॉगरों को उनके चित्र के सहारे पहचान लेने का विश्वास उस समय ढहने लगा जब त्रिविमीय आकृतियाँ स्मृति को धुँधलाने व उलझाने लगीं। चित्र में सजे मुखमण्डल सजीव रूप में और भी आकर्षक, सहज व भावपूर्ण लगे। चित्रों का सीमित संप्रेषण तब तक स्मृति पटल से नहीं हटा, जब तक बार बार देख कर यह निश्चय नहीं कर लिया कि, हाँ, यही अमुक ब्लॉगर हैं। पीछे चुपचाप बैठ कर मुलक मुलक के कई बार, बाल-सुलभ फिर भी उन्हें देखता ही रहा।
विचित्र सा लग रहा था। बौद्धिक परिचय था पहले से, पोस्टों के माध्यम से, साक्षात उपस्थिति में उनकी कई पोस्टों के शीर्षक उछल उछल कर आँखों के सामने आ रहे थे। बौद्धिक से शारीरिक ढलान में लुढ़कने के बाद जब संयत हुआ तब लगा कि इन महानुभावों के बीच स्वयं को पाना किसी महाभाग्य से कम नहीं है।
 
तल्लीनता में विघ्न तब आया जब सिद्धार्थ जी ने मेरे द्वारा कुछ विचार व्यक्त करने की सार्वजनिक घोषणा कर दी, वह भी बिना बताये। घर्र घर्र हो रही गाड़ी यदि सहसा पाँचवें गियर में डाल दी जाये तो जो प्रयास उसे सम्हालने में लगेंगे, वही प्रयास मुझे हृदयगति को सामान्य करने में लग रहे थे। विषय पर तब तक ध्यान ही नहीं दिया था, बड़े पोस्टर पर आचार-संहिता लिखा देख, विचार भी भाग खड़े हुये क्योंकि विचार तो सदा ही आवारगी-पसन्द रहे हैं। मैं तो ब्लॉगर दर्शन करने आया था, आचार-संहिता से दूर दूर का सम्बन्ध नहीं रहा, कभी भी।

यद्यपि सभाओं को सम्बोधित करने का अनुभव रहा है पर यशदीपों के सामने खड़ा, जुगनू सा टिमटिमाता, कौन सा ज्ञान उड़ेल दूँ, नहीं समझ में आ रहा था। जब घटनाओं का प्रवाह गतिशील हो, नदी का ही उदाहरण सूझता है, वही बहा कर जब मंच से उतरा तभी वास्तविकता में पुनः लौट पाया।

सभी ब्लॉगरों से बात करने का अवसर मिला जो संक्षिप्त ही रहा। अनीता कुमार जी के अतिरिक्त किसी से पहले का परिचय नहीं था अतः मुख्यतः कुशलक्षेम व ब्लॉग की प्रविष्टियों के सम्बन्ध में ही चर्चा हुयी। चर्चा भोजन के समय भी चलती रही जिससे भोजन और भी सुस्वादु हो गया था। तत्पश्चात शेष दो प्रेम-दायित्वों का निर्वाह करने निकल पड़ा।
हिन्दी के प्रति समर्पित योद्धाओं से मिलकर, साहित्य के प्रति मेरी आस्था का बल बढ़ा है। हिन्दीवर्धन में यह सम्मेलन एक सशक्त हस्ताक्षर सिद्ध होगा। सभी की अनुभूति उनकी लेखनी को और प्रबल बनायेगी और साहित्यसंवर्धन भी होगा। आयोजकों, विशेषकर कुलपति महोदय व सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी के प्रयासों को अतिशय साधुवाद, इस उत्कृष्ट आयोजन के लिये जिसकी विषयान्तर उपलब्धियाँ कहीं अधिक रहीं।
हिन्दी सम्मानम् वर्धति स वर्धा।
किसी व्यक्तित्व को कुछ पंक्तियों में व्यक्त करना कठिन है पर अपने अवलोकन को न कहना उनके प्रति अपराध माना जा सकता है अतः सबके नाम सहित लिख देता हूँ। न्यायालय की भाँति पूर्ण निर्णय सुरक्षित रख रहा हूँ, व्यक्तिगत भेंट के बाद ही निर्णय बताया जायेगा। अतः आप सभी बंगलोर आमन्त्रित हैं।


अनीता कुमार
देवीरूपा, संयत, गरिमा,
ब्लॉग जगत की एक मधुरिमा
अजित गुप्ता
अब तक तो गाम्भीर्य दिखा है,
एक प्रफुल्लित हृदय छिपा है
कविता वाचक्नवी
हिन्दी-महक, बयार लिये,
परदेशी बन प्यार लिये
रचना त्रिपाठी
आवृत गांधी खादी,
एकल ही संवादी
गायत्री शर्मा
मेधा-अर्जित आस,
रूपमयी-विश्वास
अनूप शुक्ल
मौज लेने में अपरिमित आस्था,
उसी रौ में सुना डाली दास्ता
विवेक सिंह
हाथ कैमरा, झोंके फ्लैश,
विद्वानों से क्योंकर क्लैश
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
दिवस दो काँधों सकल ब्लॉगिंग टिकी,
जी गये पल, पर जरा भी उफ नहीं की
डॉ महेश सिन्हा
देखकर स्मित सी मुस्कान,
उड़न छू परिचय का व्यवधान
हर्षवर्धन त्रिपाठी
उद्यमिता की बात कही,
सब सुधरेंगे, देर सही
संजीत त्रिपाठी
एक कुँवारा इस शहर में,
मिला उसे दोपहर में
यशवन्त सिंह
जो विचार मन में आयेगा,
यहीं अभी वाणी पायेगा
अविनाश वाचस्पति
कलमाडी की कृति अद्भुत,
पर ब्लॉगिंग में मजा बहुत
जय कुमार झा
स्वच्छ व्यवस्था करे विधाता,
हम घूमेंगे लिये पताका
रवीन्द्र प्रभात
मन बसी परिकल्पना,
शब्द दिखते अल्पना
संजय बेगाणी
छोटा तन, गुजरात बसा,
हिन्दी का विश्वास बसा
सुरेश चिपलूनकर
तिक्त शब्द, भीषण संहार,
हृदय किन्तु विस्तृत आकार
विनोद शुक्ल
निज आह्लादित, शान्त, सुहृद-नर,
है अनामिका विजयित पथ पर
जाकिर अली रजनीश
जहाँ ब्लॉग और हिन्दी वर्धित,
दिख जाते रजनीश समर्पित
अशोक कुमार मिश्र
हम पहले थे मिले नहीं,
भाव किये संवाद कहीं
प्रियन्कर पालीवाल
परिचय में संवाद सिमटकर,
थे वर्धा में एक प्रियन्कर
शैलेष भारतवासी
परिचय दृष्टि रहा बनकर,
है भविष्य-आशा तनकर
वन बिहारी बाबू
हम सम्मेलन में उन्मत थे,
आप व्यवस्था में उद्धृत थे
आलोक धन्वा
हुआ हमारा मेल नहीं,
सुना आप संग रेल रही
विभूति नारायन राय
गूँज रहा बस एक संदेशा,
ब्लॉगिंग में ही लक्ष्मण-रेखा
रवि रतलामी
गोली मारो, जियो कलन्दर,
मायावी हो घूम घूम कर
पवन दुग्गल
बच के रहना बाबा जी,
उत्श्रंखल मन बाधा जी
श्रद्धा पाण्डेय
लख ब्लॉगिंग की मदमत धार,
संग रहीं बनकर पतवार
प्रवीण पाण्डेय
जिन्दगी अलमस्त हो,
चुपचाप बहना चाहती है

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