बात तो बस शुरुआत करने की है

by प्रवीण पाण्डेय

आप के मन में कोई योजना है। आप प्रारम्भ करना चाहते हैं। दुविधा है कि अभी प्रारम्भ करें या थोड़ा रुककर कुछ समय के बाद। संशय में हैं आपका मन क्योंकि दोनों के ही अपने हानि-लाभ हैं।


अभी करने से समय की हानि नहीं होगी पर क्रियान्वयन के समय ऐसी समस्यायें आ सकती हैं जिन पर आपने पहले भलीभाँति विचार ही नहीं किया हो। ऐसा भी हो सकता है कि समस्यायें इतनी गहरी हों कि आपकी योजना धरी की धरी रह जाये।

वहीं दूसरी ओर भलीभाँति विचार करने के लिये समय चाहिये। जितना अधिक आप विचार करेंगे,  भावी बाधाओं को उतना समझने में आपको सहायता होगी। आप विस्तृत कार्ययोजना बनाने लगते हैं पर जब तक कार्य प्रारम्भ करने का समय आता है तो बहुत संभावना है कि कोई अन्य व्यक्ति उस विचार पर कार्य प्रारम्भ कर चुका हो या परिस्थितियाँ ही अनुकूल न रहें। आपका विचार और उससे सम्बन्धित बाज़ार आप के हाथ से जा चुका होगा।


आपका क्या निर्णय होगा? यह एक ऐसा निर्णय है जिस पर आपके कार्य की सफलता निर्भर करती है।

मूलतः दो प्रश्न हैं। किसी कार्य को प्रारम्भ करने का कौन सा समय सर्वोत्तम है? और कितना समय उपलब्ध है हमारे पास निर्णय के लिये?

मन में किसी नयी योजना का विचार आना एक दैवीय संकेत है और बिना समय गँवाये उस पर तत्परता से हानि-लाभ का विश्लेषण प्रारम्भ कर देना चाहिये। किसी भी विचार को लिखकर रख लेने से और विचारों के प्रवाह में स्थान दे देने से सम्बन्धित विचार द्रुतगति से आने लगते हैं। उनको लिखते जायें और अन्य पक्षों पर चिन्तन का मार्ग खोल दें। आधार जब इतना सुदृढ़ हो जाये कि मन को सन्तोष सा होने लगे तो मान लीजिये कि कार्य प्रारम्भ करने का समय आ गया है।
विचार प्रक्रिया यदि बहुत लम्बी चलने दी तो केवल बौद्धिक प्रकल्प बन कर रह जायेगी आपकी योजना। फल के पकने के बाद से टपकने तक का समय होता है हमारे पास। इसी कालखण्ड में निर्णय लेना पड़ता है हमें। प्रकृति इससे अधिक समय नहीं देती है फल तोड़ने को। आप को कैसा लगेगा कि आप जिस पके फल को तोड़ने के लिये डाल पर चढ़ने का श्रम कर रहे हैं, वह टपक जाये और कोई और उसका लाभ उठा ले। इस तरह के उदाहरणों से उद्योगों का इतिहास भरा पड़ा है।

तैयारी इसे ही कहते हैं कि पकने से टपकने तक के समय में हमारी बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक क्षमता इतनी अधिक हो कि हम फल तोड़ सकें। इसको ही संभवतः भाग्य कहते हैं। हममें से लगभग सभी ने कभी न कभी या तो समय के पहले फल तोड़ लिया या उसे टपक जाने दिया।

तैयारी पूरी रखी जाये, खिड़की सबके लिये कभी न कभी खुलती ही है।
एप्पल व पिज्जा हट का उदाहरण तो यह बताता है कि यदि आप के मन में योजना आयी है तो प्रारम्भ कर ही दें। आये विचार का को सम्मान दें, हो सकता है पुनः न आये।

चित्र साभार – http://www.mymilleniumbiz.com/ , http://silly-pants-kate.blogspot.com/

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