आवारा हूँ

by प्रवीण पाण्डेय

कुछ शब्द स्मृतिपटल पर स्थायी रूप से विराजमान हो जाते हैं, विशेषकर जब उनके साथ कोई घटना सम्बद्ध हो। बचपन, दस वर्ष से कम की आयु, एक दिन विद्यालय के बाद घर यह सोच कर नहीं आया कि अभी घर में माताजी और पिताजी को आने में देर है। मित्र के साथ नदी किनारे निकल गया, रेतीले किनारे, छोटे छोटे पत्थर नदी में डब्ब डब्ब फेंकता रहा। नदी की धार में बालसुलभ प्रश्नों की श्रंखला डुबकी लगा लेती थी पुनः सूखने के पहले। समय चुपके से कई घंटों सरक गया। सायं घर पहुँचता हूँ, कुछ कहता उसके पहले पड़ा चेहरे पर एक सन्नाट झापड़ और शब्द सुनाई पड़ा, आवारा हो गया है। आँख में बसी नदी आँख से पुनः बाहर आ गयी। माँ ने दौड़कर चिपटा लिया, समझाती रही, बहुत देर तक। हाथ पकड़ भैया के दुख भी बाँटने के प्रयास में छोटे भाई-बहन। पिता की व्यग्रता, पिछले चार घंटे से, पूरे नगर को जा जा कर टटोल डाला, अनर्थ की सम्भावनायें मन में बार बार। उस समय तो समझ नहीं आया कि व्यग्रता दोषी है या आवारगी, बस आवारा शब्द एक पूरी घटना बन स्मृति से चिपक गया।
तब से अब तक आवारगी और व्यग्रता एक दूसरे के विरोधी से लगते हैं।
जब भी कोई विचार, व्यक्ति या घटना घेरने का प्रयास करती है, छिपा हुआ आवारा जाग जाता है। पहले मुझे लगता था कि इस तरह का उन्मुक्त दिशाहीन भ्रमण, सड़कों पर, कल्पना पर, दृष्टिपथ पर, यह एक अभिरुचि है और इसे पाले जाने की आवश्यकता है। स्वयं से साक्षात्कार करने पर यह लगने लगा कि मेरी यथासंभव न हिलने की अजगरीय प्रवृत्ति में आवारगी कहाँ से आ गयी? देर से सही पर पता लग गया है कि बन्धनों की व्यग्रता मे छिपा है, मेरी आवारगी का स्रोत।

भीड़ में घिरा, भीड़ से बाहर
टीशर्ट, जीन्स, स्पोर्ट्स जूते और उन्मुक्तता पहन, काले चश्में में मन के भाव छिपा, विचार प्रक्रिया को रिसेट मोड पर वापस ला, कोई भी अवधि सीमा न रख, सरक लेता हूँ घर से। 5-6 किमी निष्प्रयोजनीय भ्रमण सड़कों पर, मॉल में, पार्क में, कॉफी की दुकान में, नितान्त अकेले, अपने भूत से विलग, भविष्य से विलग, वर्तमान को धोखा देते, किसी से कोई बात ऐसे ही अकारण, दिशाहीन, अन्तहीन, ध्येयहीन। न किसी को प्रसन्न रखने की बाध्यता, न किसी को दुख देने का मन, मैं और मेरी आवारगी, समय से उचटी, अपने में रमी। दृश्य रोचक हैं तो मुख में स्मित मुस्कान, दृश्य कटु हैं तो तनिक संवेदनीय खेद। पुनः चार घंटों के बाद घर में, अब कोई आवारा नहीं कहता है। दृष्टि से पर पढ़ लेता हूँ, ये नहीं सुधरेंगे। बच्चों को लगता है कि अब इतने हुड़दंग के बाद थोड़ा पढ़ते हुये प्रतीत हुआ जाये।
आवारा हूँ

राजकपूर के गाने भाते हैं, आवारा हूँ, जीना इसी का नाम है, जूता है जापानी। मन कुछ पहचाना सा पा जाता है, उस फिल्मीय आवारगी में। बिली जोयेल भाता है, वी डिन्ट स्टार्ट द फायर, इन द मिडिल ऑफ द नाइट। संस्कृतियों से परे आवारगी आधार ढूढ़ने लगती है, बन्धनों को तोड़ने लगती है, व्यग्रता के बन्धनों को।

वैचारिक आवारापन, बौद्धिक आवारापन, दैनिक आवारापन, सब के संग जीवन के अंग बन गये हैं, व्यग्रता से जूझने को तत्पर। अब आवारापन में बँधता जा रहा हूँ, पुनः बन्धन। दवा दर्द बन रही है। आवारगी से बाहर कैसे आऊँ, या पड़ा रहूँ दिशाहीन, जीवनपर्यन्त।
चित्र साभार – http://www.sodahead.com/
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