जाति क्या है?

by प्रवीण पाण्डेय

बड़ा सरल प्रश्न है। इस पर जब इतना कहा जा चुका है, इस पर जब इतना सहा जा चुका है, तब पूछने का औचित्य? राजनीति में जाना है या समाज को बाटने की एक नयी विधि का श्रेय लेना है? नहीं, तब क्या बौद्धिकता में खुजली हो रही है जो इतना विवादास्पद विषय उठा रहे होयह एक ऐसा शब्द है, जिसे सुन बहुतों की भृकुटियाँ तन जाती हैं पर मेरा वचन है, कुछ भी ऐसा न लिखने का, जिससे किसी को ठेस पहुँचे।

मेरे परम मित्र हैं, श्री लक्ष्मण सिंह। उनके पिताजी न्यायिक सेवा में ऊँचे पदस्थ रहे, घर में सुसंस्कृत संस्कार। सेवा की अनिवार्यताओं के कारण आम समाज से थोड़ा अलग रहा उनका प्रारम्भिक जीवन। युवक होने तक जाति जैसे किसी शब्द के सम्पर्क में नहीं आयी उनकी विचारधारा। उन्हें अटपटा लगना तब प्रारम्भ हुआ, जब जाति जैसी उपाधि के नाम पर समाज की ऊर्जा को कई दिशाओं में भटकते देखा। मेरा अनुभव भले ही कमलपत्रवत न रहा हो पर मुझे भी सदैव ही जाति के प्रसंग पर चुप रहना श्रेयस्कर लगा है। पता नहीं आज क्यों लिखने की ऊर्जा जुटा पा रहा हूँ?
  
कोई भी ऐसी विचारधारा जिसमें बाटने के बीज छिपे हों, लक्ष्मण सिंह जैसे व्यक्तियों को दुख देगी।
तब क्या विविधतायें न हों जगत में?

विविधतायें हों, उनकी नग्नता न हो। विविधतायें भी शालीन स्वरूप धरे रह सकती हैं।
हम संग हैं तो बाग बाग है, 
तब यह बन क्यों जले आग है
समृद्धि के समय विविधतायें बाग में खिले हुये पुष्पों की भाँति होती हैं, सबका अपना महत्व, सबकी अपनी प्रसन्नता। जब संसाधन कम पड़ते हैं और विपत्ति आती है, तब यही अन्तर शूल की भाँति हृदय में चुभने लगता है। किसी की उपलब्धि को उसको दी हुयी उपाधि से जोड़कर देखा जाने लगता है, उसी उपाधि को अपने कष्ट का कारण बनाकर विचार प्रक्रिया में रोपित कर दिया जाता है। अपने दुख का कारण अपने भीतर न ढूढ़कर दूसरे की उपाधियों में ढूढ़ने का प्रयत्न होने लगता है। समूह बनने लगते हैं, उनकी स्तुतियाँ होने लगती हैं, अपना तुच्छ भी उनके श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर लगता है।
जो भी पौराणिक कारण हो पर हर समूह की अपनी स्वस्थ परम्परायें होती हैं और अपने हिस्से की दुर्बलतायें। विकासशील समूह अपनी दुर्बलताओं की निर्मम बलि देकर आगे बढ़ते जाते हैं और मानसिक, बौद्धिक व आर्थिक रूप से सुदृढ़ होते जाते हैं। जो उन्मत्त रहते हैं अपने इतिहास के महानाद से, उन्हे भविष्य की पदचाप नहीं सुनाई पड़ती है और समय के चक्र में उनके क्षरित शब्द ही गूँजते रहते हैं।
हमें यदि आपस में लड़ने का बहाना चाहिये तो दसियों कारण उपस्थित हैं। भाई भाई पर घात लगाये बैठे हैं। लड़ाके शेर मेमनों को किसी न किसी विधि से लील ही जायेंगे। हमें यदि अपनी विविधता संरक्षित रखनी है तो आपत्ति काल में उसे सुरक्षित रख, कौरव व पाण्डव न बन, 105 बन खड़े हों। होना यह चाहिये कि विपत्ति के समय हमें अपनी समानतायें उभारनी चाहिये, विपत्ति से जूझने के लिये। जब देश डूबा हो, समाज रुग्ण हो, तब भी हमें यदि अपने समूह का गुणगान करने का समय मिल जाये तो आश्चर्य होना चाहिये। जीत के बाद जब विजयोत्सव मनेगा, तब अपनी परम्पराओं के अनुसार आनन्द मनायेंगे हम सब, अपने अपने इष्ट पूजेंगे हम सब।
उद्गार एक कविता के माध्यम से बहा है,
नरनारी की मानप्रतिष्ठा, पाने नित अधिकार लड़ रही,
भाषा लड़ती, वर्ण लड़ रहे, बुद्धि विषमता ओर बढ़ रही ।
देश, प्रदेश, विशेष लड़ रहे, भौहें सकल प्रकार चढ़ रहीं,
नयी, पुरातन पीढ़ी, पृथक विचार, घरों के द्वार लड़ रही ।
धर्म लड़े, बन हठी खड़े हैं, उस पर भी अब जाति लड़ी है,
देखो तो किस तरह मनुज की, लोलुपता हर भाँति लड़ी है ।।

चित्र साभार – http://www.flowerpicturegallery.com/
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