खबर पक्की है, दुर्दशा जारी है

by प्रवीण पाण्डेय

रेलवे का कलेवर आपको बाहर से सरकारी दिख सकता है पर किसी मल्टीनेशनल की भाँति हमारे अन्दर भी लाभ हानि का भाव कुलबुलाता रहता है। जहाँ पिछले वर्षों की तुलना में उच्च प्रदर्शन प्रसन्नता देता है वहीं निम्न प्रदर्शन उन कारणों का पता लगाने को प्रेरित करता है जो प्रगति में बाधक रहे। वैसे तो हर विभाग के मानक आँकड़े भिन्न हैं पर अन्ततः निष्कर्ष आर्थिक आकड़ों से आँके जाते हैं।
बात झाँसी मण्डल की है, आज से दो वर्ष पहले की। वाणिज्य विभाग का मुखिया होने के कारण एक बैठक में पर्यवेक्षकों के साथ विभिन्न खण्डों की आय पर परिचर्चा कर रहा था। पिछले वर्ष की तुलना में कम आय दिखाने वाले एक दो पर्यवेक्षकों की खिचाई हुयी। उसके बाद प्रफुल्लित मन से लाभ देने वाले खण्डों पर दृष्टि गयी तो झाँसी-महोबा-बाँदा-मानिकपुर खण्ड की आय में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि थी। सड़कों की बुरी स्थिति व बसों का तीन-चार गुना किराया कारण तो थे पर ऐसी स्थिति तो कई वर्षों से थी। कुछ अवश्य ही अलग कारण था इस वर्ष। पर्यवेक्षक से पूछने पर आशा थी कि वह अपने प्रयासों के विशेष योगदान की स्तुतियाँ गायेगा पर जब उस संवेदनशील ने बोलना प्रारम्भ किया तो उसके नयन आर्द्र थे और गला रुद्ध। वार्ता का सार यह था।
पंथ निहारूँ बड़ी देर से

इस वर्ष गाँव के गाँव दिल्ली और पंजाब की ओर पलायन कर रहे हैं। केवल वृद्ध रह गये हैं घरों की रखवाली के लिये। पशुओं को छोड़ दिया गया है अपना चारा ढूढ़ने को, इस आशा में कि वे स्वयं को जीवित रख सकेंगे पालकों के वापस आने तक। दिल्ली में नये निर्माण में व पंजाब में खेतों में काम मिलने का आसरा है इनको। खेत धूप की तीव्रता सह सह चटक चुके हैं। न कोई गुड़ाई करने वाला, न उन पर बनी मड़ैया से उन्हें ममतामयी दृष्टि से निहारने वाला, न बैलों के गले बँधे घुँघुरुओं की छन-छन, न पेड़ के नीचे कोई सूखी रोटी प्याज-नमक के साथ खाने वाला। जमीन के लिये जान लेने और देने की बातें करने वाले, अपनी अपनी जमीन को त्यक्तमना छोड़ पलायन कर गये हैं। पिछले दो वर्षों से आँखें आसमान पर टिकाये रहने से थक गये निवासी अपने लिये नयी छत ढूढ़ने समृद्धदेश चले गये हैं। जल स्तर भी मुँह मोड़ पाताल में समा गया। तालाब कीचड़ का संग्रहालय बन गये हैं।

उल्लिखित खण्ड उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश को दसियों बार काटता है। मानचित्र पर लकीर खीचते समय तो कई बारीकियों के कारण खिचपिच मचा चुके लोग, यहाँ के निवासियों की दुर्दशा को मानसूनी कारण का कफन उढ़ा चुके हैं। आल्हा ऊदल की नगरी और तालों का नगर कहे जाने वाले महोबा में जब पानी के टैंकरों से पानी लूटने में हत्यायें होते देखता हूँ तो सारा अस्तित्व ही सिहर उठता है। यही स्थिति रही तो गाँव के साथ साथ नगर भी त्यक्त हो जायेंगे। जब तक दुर्दशा रहेगी, आय में वृद्धि रहेगी। जब दुर्दशा पूर्ण होगी तब न कोई जाने वाला रहेगा और न ही कुछ आय होगी।
बढ़ी हुयी आय के पीछे एक समग्र दुर्दशा देखकर मन चीत्कार कर उठा। कुछ बोल नहीं सका, आँख बन्द कर बैठा रहा। मेरे स्वभाव से परिचित सभी पर्यवेक्षक भी बिना कुछ बोले कक्ष से चले गये। घर आकर बिना कुछ खाये ही भारी पलकें नींद ले आयीं।
कल कई ब्लॉगरों की संस्तुति पर पीप्ली लाइव देखने गया तो दो वर्ष पुराना घाव पुनः हरा हो गया। अपने बुन्देलखण्ड में वीरों के रक्तयुक्त इतिहास को अश्रुयुक्त भविष्य में परिवर्तित होते देख मन पुनः खट्टा हो गया।

कल झाँसी बात की, उस खण्ड की आय पूछी, आय अब भी बढ़ रही है।
आप भी दो आँसू टपका लें। खबर पक्की है, दुर्दशा जारी है।

चित्र साभार – http://kisanbachao.blogspot.com/

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