पीड़ा कह दो

by प्रवीण पाण्डेय

जीवन में विधि ने लिख डाले, कुछ दुख तेरे, कुछ मेरे हैं,

जीना संग है, फिर क्यों मन में, एकाकी भाव उकेरे हैं ।
ढालो शब्दों में, बतला दो, पीड़ा आँखों से जतला दो,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिकदृगनीर बिखेरें हैं।१।
माणिक-दृग-नीर

भटके हम दोनों मन-वन में,

पर बँधे रहे जीवन-क्रम में,
बन प्राण मिला वह जीवन को,
घर तेरा है, सज्जित कर लो ।
क्यों सम्बन्धों के आँगन में, अब आशंका के डेरे हैं,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिकदृगनीर बिखेरें हैं।२।
निश्चय ही जीवन को हमने,
पाया तपते, मन को जलते,
क्यों पुनः बवंडर बन उठतीं,
मन भूल गया स्मृतियाँ थीं ।
आगन्तुक जीवनसुखरजनी, क्यों चिंतास्याह घनेरे हैं,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिकदृगनीर बिखेरें हैं।३।
अति शुष्क हृदय है, यदि सुख की,
आकांक्षा रह रहकर उठती,
मन में क्यों दुखचिन्तन आये,
मिल पाये नहीं जो सुख चाहे ।
अर्पित कर दूँगा सुख जो भी, आमन्त्रण से मुँह फेरे हैं,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिकदृगनीर बिखेरें हैं।४।
क्यों मन, आँखें, उद्विग्न, भरी,
पड़ती छाया आगतदुख की,
पहले क्यों शोक मनायेंगे,
दुख आयेंगे, सह जायेंगे ।
तज कातरता निश्चिन्त रहो, मेरी बाहों के घेरे हैं,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिकदृगनीर बिखेरें हैं।५।
यहीं बसेरा हम दो कर लें,
जीवनघट, सुख लाकर भर लें,
और परस्पर होकर आश्रित,
सुखआलम्बन बन जायें नित ।
जीवन छोटा, संग रहने को, पल मिले नहीं बहुतेरे हैं,
मैं ले आऊँगा जहाँ जहाँ, माणिकदृगनीर बिखेरें हैं।६।

अर्चना चावजी की सुझायी धुन पर गाने को दुस्साहस किया है। थोड़ा सुन लें।
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चित्र साभार – http://www.luvemorleavem.com/

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