फूलों का मुस्कराना

by प्रवीण पाण्डेय

जब भी भावों को व्यक्त करने के लिये माध्यमों की बात होती है, फूलों का स्थान वनस्पति जगत से निकल कर मानवीय आलम्बनों की प्रथम पंक्ति में आ जाता है। प्रकृति के अंगों में रंगों की विविधता लिये एक यही उपमान है, शेष सभी या तो श्वेतश्याम हैं या एकरंगी हैं। फिल्मों में भी जब कभी दर्शकों को भावों की प्रगाढ़ता सम्प्रेषित करनी हो तो फूलों का टकराना, हिल डुल कर सिहर उठना, कली का खिलना आदि क्रियायें दिखाकर निर्देशकगण अपनी अभिव्यक्ति की पराकाष्ठा पा जाते हैं। कोई देवालय में, कोई कोट में, कोई गजरे में, कोई पुष्पगुच्छ में और कोई कलाईयों में लपेट कर फूलों के माध्यम से अपने भावों को एक उच्च संवादीस्वर दे देते हैं। प्रेमीगण रात भर न सो पाने की उलझन, विचारों की व्यग्रता, मन व्यक्त न कर पाने की विवशता और भविष्य की अनिश्चितता आदि के सारे भाव फूलों में समेटकर कह देना चाहते हैं। भावों से संतृप्त फूलों के गाढ़े रंगों को समझ सकने में भी दूसरे पक्ष से आज तक कभी कोई भूल होते नहीं देखी है हमने।

कहानी छिपाये है खिलती कली
अब भावों की भाषा को सरल बनाते रंग बिरंगे संवाहकों को कोई कैसे केवल सौन्दर्यबोध की श्रेणी में ही रख देने की भूल कर सकता है। फूल पा कर भाव समझ लेना आपकी योग्यता भले न हो पर भाव न समझ पाना मूर्खता व संकटआमन्त्रण की श्रेणी में अवश्य आ जायेगा। एक बार जब सुबह उठने पर अपने सिरहाने पर रखे गुलदस्ते पर कुछ फूल रखे पाये तो बड़ा अच्छा लगा। हम बिना भाव पढ़े सौन्दर्यबोध में खो गये। दिनभर के रूक्ष पारिवारिक वातावरण में सायं होते होते अपनी भूल समझ में आ गयी। बंगलोर आने के बाद घर मे हुये पहले फूल के बारे में अपने हर्षोद्गार व्यक्त न करना घातक हो सकता था, इसका अनुमान लग गया हमें। दिनभर मानसिक उत्पात के बाद उत्पन्न हुयी बिगड़ी स्थिति को अन्ततः फूलों ने ही सम्हाला हमारे लिये। यदि विश्वास न हो तो आप भी प्रयोग कर के देख लें।

बंगलोर की जलवायु बड़ी मदिर बनी रहती है, वर्षभर। यहाँ के विकास में, जनमानस के स्वभाव में और कार्य का माहौल बनाये रखने के अतिरिक्त फूलों के उत्पादन में भी इसी जलवायु का महत योगदान है। संसार भर में पाये जाने वाले सभी फूलों का उत्पादन कर उनके निर्यात के माध्यम से यहाँ की अर्थव्यवस्था को एक सुदृढ़ भाग प्रदान करता है यहाँ का फूलव्यवसाय। यहाँ की संस्कृति में फूलों का उपयोग हर प्रकार के धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठानों में बहुतायत से होता है। महिलाओं के सौन्दर्य प्रसाधन का अभिन्न अंग है, फूलों का गजरा।

यहाँ के जीवन में फूलों की सर्वमान्य उपस्थिति का एक उच्चारण है यहाँ पर होने वाली वार्षिक पुष्प प्रदर्शनी। पूरे देश से आये फूलों का अप्रतिम व सुन्दरतम प्रदर्शन। गत रविवार हमारे सौभाग्य की कड़ी में एक और अध्याय जुड़ गया जब सपरिवार इस प्रदर्शनी को देखने का अवसर मिला। सुबह शीघ्र पहुँचने से बिना अधिक प्रतीक्षा किये देखने को मिल गया क्योंकि वापस आते समय सैकड़ों की संख्या में नगरवासी टिकटार्थ खड़े थे। मन के कोमल भावों की सुन्दरतम अभिव्यक्ति के वाहकों की प्रदर्शनी न केवल दृष्टि के लिये अमृतवत थी वरन भीनी भीनी सुगन्ध मन को दूसरे लोकों में ले जाने में सक्षम प्रतीत हो रही थी।

मन पूर्णतृप्त था, उपकार फूलों का, जीवन के रंगों में घुल जाते रंग,भावों को कहते अपनों के संग।

आप प्रदर्शनी में दिखाये कुछ दृश्य देखें और अगली बार जब भी कोई फूल दिखे, उसमें छुपाये और सहेजे भावों को पढ़ने का यत्न अवश्य करें।

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