मेरे देश का मानचित्र कौन बनायेगा

by प्रवीण पाण्डेय

बड़े घर की समस्या यह है कि सबको अपने अपने कमरे चाहिये होते हैं। मुझे तो पहली बार अपना कमरा आईआईटी के तीसरे वर्ष में जाकर मिला था अतः मेरा अनुभव इस समस्या के बारे में कम ही था। पृथु और देवला अभी तक एक कमरे मे ही थे। देवला की सहेलियों की गुड़िया-प्राधान्य बातों से व्यथित हो, पृथु ने अलग कमरे की माँग रख दी। एक अतिरिक्त कमरा था, अतः दे दिया गया।

देवला द्वारा निर्धारित घर का मानचित्र 

पृथु को अलग कमरा क्या मिला, देवला ने विद्रोह कर दिया। जिन सुविधाओं पर अब तक दोनों का साझा अधिकार था, उनमें से कुछ के लिये अब उसे चिचौरी करनी पड़ सकती थी। अब घर में सबसे अधिक मुखर वही है, तर्क दे तर्क, पीछे पड़ी रही। पहले तो हम टालते रहे। उसके बाद तथ्यों में उलझाने का प्रयास किया। बातचीत तो कितनी भी लम्बी खींची जा सकती है। हम लोगों के टालमटोलू रवैये से उकता कर वह कागज और पेन लायी, घर का मानचित्र बनाया और सबके कमरे पुनः निर्धारित कर दिये। मुझे सबसे बड़ा विरोधी मान सबसे छोटा और कम सुविधाओं वाला कमरा दिया गया। अब इस विषय पर कमेटी व सब कमेटी बनाये बिना ही हमें ऐसा समाधान निकालना पड़ा जिससे समस्या अन्ततः हल हो गयी। इस विषय में मेरा अनुभव भी थोड़ा और बढ़ गया।

मेरा देश भी बड़ा है, सबके अपने अपने कमरे हैं। अब घर के हर कमरे में यदि एक दरवाज़ा बना दिया जाये बाहर जाने के लिये तो घर का स्वरूप कैसा होगा। कश्मीर अपना दरवाज़ा खोलकर बैठा है, उत्तरपूर्व अपना दरवाज़ा खोलकर बैठा है। सूराख और सेंधें तो दसियों लगी हैं। घर के अन्दर कमरों में बैठे लोगों ने अपना स्वातन्त्र्य घोषित कर दिया है। नक्सल अपना मानचित्र बनाये बैठे हैं। मुम्बई के मानचित्र को कोई अपना बता चुका है। कोई जाति विशेष, धर्म विशेष के कमरों का प्रतिनिधि बना बैठा है देश के सबसे बड़े कमरे में। देश को कब्जा कर लेने की प्रक्रिया चल रही है, देश के मानचित्र में अपने प्रभुत्व की रेखायें खींच रहे हैं कुछ ठेकेदार, यह भी नहीं जान पा रहे हैं कि अब उससे रक्त की धार बहने लगी है। देश की चीत्कार नहीं सुन पा रहे हैं, संभव है कि उसकी मृत्यु का संकेत भी न समझ पायें ये रक्तपिपासु।
 
इतनी ढेर सारी क्षेत्रीय समस्यायें देख कर तो लगता है कि समस्यायें भी मदिरा की भाँति होती हैं। जितनी पुरानी, उतना नशे में डूबी। यदि तुरन्त सुलझ गयीं तो क्या आनन्द? सारा देश इसी नशे में आकण्ठ डूबा है।

मेरे घर का छोटा सा विवाद, बिटिया की सुलझाने की इच्छा व दृढ़विश्वास, समाधान एक मानचित्र के रूप में आ गया।

मेरे घर का मानचित्र तो बिटिया बना लाई, मेरे देश का मानचित्र कौन बनायेगा?

इसको कौन सबके मन में बसायेगा

आह्वान है उनसे जिनके हाथ में कुछ लिख देने की क्षमता है, आह्वान है उनसे जिनकी वाणी का प्रभाव अंगुलिमालीय मानसिकतायें बदल सकता है, आह्वान है उनसे जो इतिहास के पन्नों में न खो जाने की चाह रखते हैं, आह्वान है उनसे जिनकी दृष्टि देश का खण्डित स्वरूप देखकर पथरा जाती है और आह्वान है उनसे जो मूक दर्शक हैं इस अलगाववादी तांडव के। आप सब में देश का मानचित्र बना देने और उसे सबके अस्तित्व में बसा देने की क्षमता है।

का चुप साधि रहा बलवाना।
   
मेरा विश्वास है कि मेरा नैराश्य मेरी मृत्यु तक जीवित नहीं रहेगा क्योंकि यदि मेरी बिटिया में घर का मानचित्र बनाकर मेरे सम्मुख रख देने का साहस है तो वह और उसके सरीखे अनेक बच्चे कल हमारे हाथों से निर्णय का अधिकार छीनकर देश का मानचित्र भी बना देंगे।
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