अब बढ़ना बन्द

by प्रवीण पाण्डेय

ज्ञानी कहते हैं कि जीवन में शारीरिक ढलान बाद में आता है, उससे सम्बन्धित मानसिक ढलान पहले ही प्रारम्भ हो जाता है। किसी क्रिकेटर को 35 वर्ष कि उम्र में सन्यास लेते हुये देखते है और मानसिक रूप से उसके साथ स्वयं भी सन्यास ले लेते हैं। ऐसा लगता है कि हमारा शरीर भी अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के लिये ही बना था और अब उसका कोई उपयोग नहीं। घर में एक दो बड़े निर्णय लेकर स्वयं को प्रबुद्ध समझने लगते हैं और मानसिक गुरुता में खेलना या व्यायाम कम कर देते हैं। एक दो समस्यायें आ जायें तो आयु तीव्रतम बढ़ जाती है और स्वयं को प्रौढ़ मानने लगते हैं, खेलना बन्द। यदि बच्चे बड़े होने लगें तो लगता है कि हम वृद्ध हो गये और अब बच्चों के खेलने के दिन हैं, अब परमार्थ कर लिया जायें, पुनः खेलना बन्द। कोई कार्य में व्यस्त, कोई धनोपार्जन में व्यस्त, व्यस्तता हुयी और शारीरिक श्रम बन्द।

इन सारी विचारधाराओं से ओतप्रोत पिछले एक दो वर्षों से हम भी शारीरिक श्रम से बहुत कन्नी काटते रहे। बीच बीच में कभी कोई क्रिकेट मैच, थोड़ा बैडमिन्टन, पर्यटन-श्रम और मॉल में घुमाई होती रही। भला हो फुटबॉल के वर्ल्डकप का, एक दिन कॉलोनी में खेलते खेलते पेट शरीर से अलग प्रतीत होने लगा। लगने लगा कि पेट साथ मे दौड़ना ही नहीं चाहता है। केवल 10 वर्ष पहले तक पूरे 90 मिनट तक फुटबाल खेल सकने का दम्भ स्वाहा हो गया। उस समय आवश्यक कार्य का बहाना बना कर निकल तो लिये पर स्वभाववश स्वयं से भागना कठिन हो गया। लगने लगा कि यह ढलान अब रोकना ही पड़ेगा।

आज के युग में सुविधा पाये शरीर को हिलाना सबसे बड़ा कार्य है। इस समय मन भी शरीर के साथ जड़ता झोंकने लगा। एक प्राण, दो दो शत्रु। एक साथ दो शत्रुओं से निपटना कठिन लगा तो निश्चय किया गया कि पहले बड़े शत्रु को निपटाते हैं, छोटा तो अपने आप दुबक लेगा। अन्तःकरण ने निश्चय की हुंकार भरी कि आज से मानसिक ढलान बन्द।
अब बढ़ना बन्द।
स्वास्थ्य हेतु श्रम
सुबह जल्दी उठे। घर में ही पिजरें में बन्द सिंह की भाँति चहलकदमी की। सबको लगा कि अब सुबह सुबह कैसा तनाव? उन्हें क्या ज्ञात कि चंचलं हि मनः कृष्णः की ख्याति प्राप्त योद्धा को जीतने का प्रयास चल रहा है। वाणिज्यिक आँकड़ों को भी आज के दिन ही गड़बड़ होना था। फोन से ही सिहांत्मक गर्जना हुयी तो पर्यवेक्षकों को सधे सधाये तन्तु हिलते दिखे। थोड़ी देर में दिल तो बच्चा है जी का गाना रिपीट में लगा ब्लॉगीय झील में उतर गये। जब 8-10 बार बजने के बाद पर्याप्त मानसिक आयु कम हो गयी तो ही अन्य क्रियाकलाप प्रारम्भ किये। मन को इस रगड़ीय स्थिति में कढ़ीले लिये जा रहे थे पर सायं होते होते शरीर नौटंकी करने लगा। सायं को खेलने गये जिससे पुनः हल्का अनुभव होने लगा। रात को शान्त-क्लांत निद्रा-उर में सिमट गये।
एक बार रॉबिन शर्मा को कहते सुना था कि 21 दिन पर्याप्त होते हैं किसी नयी आदत को डालने में और स्वयं को उसके अनुसार ढालने में। अभी कुछ दिन ही हुये हैं गति पकड़े पर निश्चय 21 दिन का नहीं वरन जीवन पर्यन्त का है।
अब बढ़ना बन्द।
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। मन को साधने से शरीर सधने लगता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिये इसको बहुत प्यार से सम्हाल कर रखने की आवश्यकता नहीं है संभवतः। अंगों का स्वभाव है श्रम। स्वभाव में जीने से सब आनन्द में रहते हैं, स्वस्थ भी रहते हैं। स्वस्थ शरीर का पुष्ट भौतिकता के अतिरिक्त उच्च बौद्धिक व आध्यात्मिक स्तर बनाये रखने में बड़ा योगदान है। 
अब अगले कई वर्षों तक मेरी आयु न पूछियेगा। मैं 37 ही बताऊँगा।
क्योंकि, अब बढ़ना बन्द।
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