मॉल और माइक्रोसॉफ्ट

by प्रवीण पाण्डेय

तब पढ़ाई हो, यह कारण रहता था  पिता जी के साथ बाजार न जाने का। अब लड़ाई न हो, इस कारण से बाजार जाना पड़ता है। हमारी भागने की प्रवृत्ति हमको घेर के वहाँ पर ले आती है जहाँ पर कोई विकल्प नहीं रहता और अन्ततः वही कार्य करने पड़ते हैं, जिनसे हम सदैव भागते रहते हैं।


हम जैसे प्रशिक्षार्थियों के लिये मॉल खुल जाने से यह कार्य अब उतना कष्टप्रद नहीं रह गया है। बाज़ारों के धूल-धक्कड़ से दूर मॉल का शीतल वातावरण व मनपसन्द वस्तुयें चुन पाने की सुविधा हम सबको सुहाती भी है। अब बच्चों का भविष्य हमारे वर्तमान की तरह न हो इसलिये उन्हें भी साथ ले लिया जाता है। मॉल में देवला ट्रॉली पकड़ती हैं और पृथु लिस्ट से सामान बता कर उसमें डालते रहते हैं। हमारा कार्य शंकाओं का समाधान करना होता है, कारण सहित। पारिश्रमिक कितना दिया गया, यह तब पता लगता है जब घर आकर लिस्ट के बाहर के सामानों का जोड़ होता है। कुछ दिनों में दोनों  इतने योग्य हो जायेंगे कि स्वयं जाकर ही खरीददारी कर आया करेंगे। बाल श्रम नहीं है, यह उनकी तैयारी है आगामी जीवन के लिये।

सब कुछ इसमें ही है

मॉल में बिलिंग यन्त्रवत सी लगती है। एक लड़का बार कोडिंग मशीनके सम्मुख सामान दिखाता और आगे बढ़ा देता। 2000 का बिल बनाने में 30 सेकेण्ड समय लगा होगा। किसी गणितीय भूल की संभावना नहीं और समय की बचत भी।


इस पूरे प्रकरण में बस एक बात खटकी। मुझे अनायास ही अपने विद्यालय के एक मित्र अनुराग की याद आ गयी, वह अभी माइक्रोसॉफ्ट में है।
अनुराग की गणितीय गणना करने की क्षमता हम सबसे कहीं अधिक थी। कारण था बचपन में उसका अपने पिता जी की दुकान में बहुधा अकेले बैठना। छोटे कस्बे में छोटा व्यवसाय था। कोई कैलकुलेटर नहीं, कोई कम्प्यूटर नहीं, सब गणना मानसिक। भूल का अर्थ था हानि। वही क्षमता उसे पहले आई आई टी तक लायी और अन्ततः माइक्रोसॉफ्ट तक ले गयी।
मॉल संस्कृति जिस गति से फैल रही है, लगता है कि कुछ ही समय में सारे के सारे छोटे व्यवसायों और व्यवसायियों को सुरसावत निगल जायेगी। मॉल में लगी भीड़ इसका प्रमाण मात्र है। सीधे उत्पादन से उपभोक्ता तक सामान लाने की पूरी प्रक्रिया कम्प्यूटरों पर बिछी हुयी है। उद्देश्य लागत न्यूनतम करना है।
अब छोटे व्यवसाय नहीं रहेंगे तो कई और अनुराग उन दुकानों में कैसे बैठेंगे? कैसे उनकी गणितीय क्षमता पल्लवित हो सकेगी? माइक्रोसॉफ्ट को तब कैसे उतने योग्य मस्तिष्क मिल पायेंगे?

बिलिंग के 25 काउण्टरों में मुझे एक भी अनुराग नहीं दिखा, दिखा तो एक अर्थव्यवस्था का वह चेहरा जिसे न छोटी दुकानों की आवश्यकता है और न उसमें बैठने वालों अनुरागों की। मुझे यह भी दिखा कि भारत अपनी जिस बौद्धिक और मानसिक क्षमता पर इतना इतराता है, उनका भी मूल्य कम कर देंगे बाजार-व्यवस्था के समर्थक। अब मुहल्ले में आर्थिक समस्याग्रस्त लोगों को उधार कौन देगा? अब माइक्रोसॉफ्ट को अनुराग कौन देगा? हम जैसे विद्यार्थियों को ईर्ष्या करने के लिये अनुराग कौन देगा?

कई अनुराग खो गये हैं इन्ही मॉलों में। किसी को भी, किसी भी मॉल में, कभी भी यदि अनुराग दिखे तो मुझे बता दें। मुझे तो बस मेरा अनुराग वापस चाहिये।
Advertisements