मेरे कुम्हार

by प्रवीण पाण्डेय

मुझे बन दीप जलना है
यूँ तो जीवन में जो भी मिला कुछ न कुछ सिखाता गया। प्रारम्भ माता पिता से किया और सम्प्रति बच्चों से सीख रहा हूँ। बीच में पर व्यक्तित्वों की एक श्रंखला है जो ढालते गये गीली मिट्टी को एक उपयोगी पात्र में, रौंद कर अनुशासन तले, अभ्यास के चाक में बार बार घुमाकर, विकारों को ठोंक पीट कर और तप की आग में तपा कर। यद्यपि मिट्टी को यह बर्ताव उस समय नहीं सुहाता है पर जब एकान्त में निर्विकार चिन्तन होता है तब उन कुम्हारों को बहुत याद करता होगा पात्र। बिन उनके तो वह बना रहता लोंदा, मिट्टी का, पृथ्वी पर भार।
कुम्हार को क्या पड़ी है, हाथ गन्दा करने की? क्या पड़ी है बार बार ध्यान दे देकर अपना समय व्यर्थ करने की? क्या पड़ी है बर्तन के साथ स्वयं तपने की? क्यों उलझ गये मेरे लोंदीय अस्तित्व से? मुझे पड़ा रहने देते, मैं जैसा था। कह देते कि यह मिट्टी किसी योग्य नहीं है। कह देते कि इसमें सुपात्र तो क्या, पात्र बनने की भी योग्यता नहीं है। कह देते कि व्यक्तित्व के अनियमित उभार यूँ ही वक्र रहेंगे और खटकते रहेंगे समाज की दृष्टि में। न भी घ्यान देते तो भी उनकी जीविका चल रही थी और चलती रहती, मैं पड़ा रहता मिट्टी के ढेर में एक और लोंदे सा।

यह मेरा प्रारब्ध था या उनका स्वभाव। मेरी लालसा थी सीखने की या उनकी उत्कण्ठा अधिकाधिक बताने की। तथ्यों पर मेरी ध्यान न देने की प्रवृत्ति पर उनकी ध्यान दिलाने की आवृत्ति अधिक भारी पड़ी। हठ मेरा न सुधरने का या विश्वास उनका कि यह सुधरकर रहेगा। मैं टोंका जाता गया, मेरा विरोध, अनमनापन, आलस्य बार बार टोंका गया। जब समझने योग्य बुद्धि हुयी तब कहीं मेरे कुम्हारों को जाकर विश्वास हुआ कि अब यह योग्य है और तब ही मुझे छोड़ दिया गया समाज में अपना अनुभव-घट स्वतः भरने के लिये।
उनकी याद मुझे दर्पण में अपनी आँखें देखकर ही आ जाती है। आँखों की गहराई में बस गया स्थायी इतिहास सहसा बात करने लगता है। एक एक तथ्य बोलते हुये निकल कर सामने आने लगते हैं।
बचपन मेरा और बुढ्ढे मास्साब की वृद्धावस्था। मेरी चंचलता पर उनका धैर्य भारी पड़ा। कुम्हार जाति के थे, संभवतः तभी उनको आता था कि इस लोंदे को कैसे गढ़ना है, धैर्यपूर्वक। हाथ में कलम पकड़ाकर एक एक अक्षर लिखना सिखाया। आज जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लिखता हूँ फाइलों पर तो मुझे मेरे बुढ्ढे मास्साब का हाथ अपने हाथों में धरा प्रतीत होता है।

विद्यालय में आया तो अध्यापकों का हर माह घर आना याद आता है। पूरे माह इस दिन की प्रतीक्षा यह जानने के लिये करता था कि कहीं अनजाने में कोई भूल तो नहीं हो गयी।
कानपुर पढ़ने छात्रावास में आया तो एक अध्यापक मिले, मराठी। बाहर से बड़ी सी डरावनी दाढ़ी और अन्दर से उतना ही मृदुल हृदय। अनुशासनप्रिय। छात्रावास में रहने के बाद भी क्या हिम्मत कि बिना पूछे बाहर जाकर चाट खा आयें। बहुत दिनों तक अखरता रहा यह अनुशासन पर अब वही एक संचित कोष लगता है उन क्षणों का जिसमें मेधा ने विकास की अँगड़ाई ली।
कई अध्यापक जो समाज के सभी भागों का प्रतिनिधित्व करते थे, निस्वार्थ भाव से मेरे ज्ञानकोष में अपने अनुभव का अंबार उड़ेल कर चले गये, बार बार समझा कर, बार बार डाँट कर, इस पात्र को आकार दे गये।
  
गढ़े जाने का क्रम बना रहा, समाज ने जितना सिखाया, उतना सीखता रहा, सबसे सीखा। संभवतः आज की राजनीति का प्रभाव न था मेरे ऊपर, संभवतः सारे भेद ज्ञान से निम्न जान पड़ते थे मुझे। कई राज्यों के ऋण हैं मेरे ऊपर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड, बिहार, उत्तरप्रदेश और अब कर्नाटक। हर संस्कृति ने व्यक्तित्व में कुछ न कुछ जोड़ा ही है।
मुझे अपनी आँखों में जाति, भाषा, राज्य और धर्म से परे कुम्हारों की श्रंखलायें दिखायी पड़ती हैं। अब कोई मुझसे किसी एक का पक्ष लेने की मानसिकता सिखाये तो मैं अपने कुम्हारों को क्या उत्तर दूँगा? कैसे उनकी आकांक्षायें अपने बर्तन से हटाऊँगा? हटाने से मेरे व्यक्तित्व में वह छेद हो जायेगा जिससे मेरा अस्तित्व ही बह जायेगा, इन संकीर्ण नालियों में।
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