मध्यमवर्गीय ! हाँ बस यहीं ठीक है

by प्रवीण पाण्डेय

आँख बन्द करता हूँ और पूछता हूँ स्वयं से कि मैं कहाँ हूँ? मैं कौन हूँ, यह प्रश्न पूछा जा चुका है अतः वह पुनः पूछना कॉपीराइट का उल्लंघन हो सकता था।

अनगूगलीय उत्तर आता तुम इस विश्व के मध्य में हो तात, तुम मध्यमवर्गीय हो

सहसा ज्ञानचक्षु खुल जाते हैं और सारे विश्व से अपनत्व होने लगता है। दसों दिशाओं में विश्व दिखने लगता है। प्राण में, ज्ञान में, धन में, मन में, श्रम में और हर क्रम में।
बचपन से अभी तक हम सबके नाम से चिपक सा गया है यह शब्द, मध्यमवर्गीय। सहज सा परिचय। इस शब्द को बनाने वाले को भान भी न होगा कि यह शब्द इतना हिट हो जायेगा और सब लोग ही इससे सम्बन्ध रखना चाहेंगे।
मध्यमवर्गीय, सब प्रकार से

इस शब्द का प्रथम उपयोग आर्थिक आकलन के लिये हुआ होगा पर यह शब्द अब हमारी मानसिक व बौद्धिक क्षमताओं में साधिकार घुस चुका है। हमारा आर्थिक रूप से मध्यमवर्गीय होना हमें भले न कचोटे पर मानसिक व बौद्धिक मध्यमवर्गीयता हमारे समाज व देश के ऊपर कभी न मिटने वाला धब्बा बनकर चिपका हुआ है।

ऐतिहासिक साक्ष्यों ने भारतीयों को सदैव ही मानसिक व बौद्धिक क्षमताओं के मुहाने पर खड़ा पाया है। क्या हुआ अब हमें? क्या हमारी सुविधाजनक जीवन शैली हमें मध्यमवर्गीय बने रहने पर विवश कर रही है? हम भीड़ के मध्य खड़े रहने में स्वयं को अधिक सुरक्षित समझते हैं। कोई भी क्षेत्र हो, हम थोड़ा ही आगे बढ़कर संतुष्ट हो जाते हैं। हमें लगता है कि हम लोग को सीमायें निर्धारित करने का दायित्व ईश्वर ने दिया ही नहीं है, वह तो रडयार्ड किपलिंग के आंग्ल-पुरुष का भार है अभी तक।

यह भार-विहीन अस्तित्व कितना सुखदायी है, मध्यमवर्गीय। इस शब्द में पूरा सार छिपा है जीवनचर्या का जो मध्यसागर में हिंडोले लेती रहती मध्य में ही अस्त हो जाती है।
अब तो फूल रहा है देश का पेट

कई जगहों पर पढ़ा है कि देश व समाज की दिशा मध्यमवर्गीय ही निर्धारित करते हैं क्योंकि उच्चवर्गीय को समय नहीं है उपभोगों से और निम्नवर्गीय अपने अस्तित्वों के युद्ध में ही उलझे रहते हैं जीवनपर्यन्त। इन दोनों विकारों से मुक्त मध्यमवर्गीय के पास ऊर्जा रहती है समाज के दिशा निर्धारण की। तर्क दमदार है पर जिनको लक्ष्य कर लोग आशाओं में जी रहे हैं, वही राह तक रहे हैं नायकों की। जिनकों नायकों का दायित्व निभाना है वे मध्यमवर्गीय का टैग लगा लखनवी गरिमा का अनुसरण कर रहे हैं।

निष्कर्ष स्पष्ट है समय पटल पर। नायकों का नितान्त आभाव है। अब सत्ता के आसन खाली नहीं रखे जा सकते है तो स्वतः भर रहे हैं। कारण भी स्पष्ट है, हमारी मध्यमवर्गीय मानसिकता व बौद्धिकता।
पहाड़ में बीच ढाल में बैठे देखा है किसी को? तो आप वहाँ पर सुस्ता रहे हैं, क्षणिक या वहीं टिके रहना चाहते हैं, शाश्वत। टिके रहने की सोची तो लुढ़क जायेंगे नीचे, पता भी नहीं चलेगा और अस्तित्व के परखच्चे उड़ जायेंगे। ऊपर बढ़ते जाइये, वहीं पर स्थायित्व है। मध्यमवर्गीयता अर्थक्षेत्र में रहने दें, मन और बुद्धि में रख कर अनर्थ न करें।
  
मध्यमवर्गीय उपमान बुद्ध के मध्यमार्गी उपासना से मिलता जुलता लग सकता है पर है नहीं। बुद्ध किसी भी पथ में अति न करने की सलाह देते हैं, गति न करने की नहीं।

चित्र साभार

http://www.lbhat.com/apple/by-ignoring-india-apple-is-making-a-big-mistake/ 

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