वेल डन अब्बा

by प्रवीण पाण्डेय

बरसात की बलखाती फुहारें, शीत-सिरहन सिसकाती हवा, दिन का अलसाया अँधेरा, गले से गर्मी उतारती चाय, तेल की आँच में अकड़ी पकौड़ियाँ, मन में कुछ न करने का भाव, उस भाव के आनन्द में पसरा सप्ताहान्त। चाह थी बस एक आलम्बन की जो इस भाव को यथासम्भव, यथारूप और यथासमय वैसा ही बनाकर रख सके। चाह को राह मिलती है और कहीं से आकर वेल डन अब्बा‘ स्क्रीन पर चलने लगती है।

मुस्कान के सीधे साधे अब्बा जब एक महीने की जगह तीन महीने बाद अपनी ड्राइवर की नौकरी में वापस लौटते हैं तो उनके बॉस उन्हें नौकरी से हटा देते हैं। रुँआसा सा मुँह बना बताते हैं कि बावड़ी में गिर जाने के कारण इतना समय लग गया। बॉस को पुणे के लिये निकलना है, शीघ्रता है, न जाने क्या सोचकर साथ ले लेते हैं। अब्बा अरमान अली जी गाड़ी के स्टेयरिंग पर बैठे हैं और पीछे बैठे बॉस को पिछले तीन महीने का कथानक सुनाते हैं।

अरमान अली की मुस्कान

इकलौती बिटिया पढ़ी लिखी है, तेज है, विवाह योग्य है और रहती है एक तहसील में अपने आलसी चाचा चाची के साथ। बिटिया के विवाह हेतु छुट्टी ले घर पहुँचे अरमान अली को पता लगता है एक सरकारी योजना के बारे में जिसमें बावड़ी खुदवाने के लिये सरकार आर्थिक सहायता देती है। यह सोचकर कि पानी रहने से खेतीबाड़ी अच्छी हो जायेगी जिससे कोई अच्छा लड़का मिल जायेगा घर जमाई बनाने के लिये।

यहाँ से प्रारम्भ होती है एक सरकारी यात्रा जो देश के सभी भागों में स्थानीय संस्कृति की बयार लिये अनवरत चलती रहती है। देश में चल रही कल्याणकारी योजनाओं का चरित्र दिखलाती इस फिल्म की कहानी बड़ी ही सीधी है पर चोट गहरी करती है व्यवस्था पर। विचार संप्रेषण में श्याम बेनेगल का निर्देशन दर्शकों को सदैव प्रभावित करता रहा है।

सरपंच, तहसीलदार, विकास अधिकारी, इन्जीनियर और ठेकेदार के पदों को आर्थिक सहायता से ही एक निश्चित भाग प्रदान करने के बाद जो धन प्रथम किश्त में बचता है, उससे कुछ न हो पाने की स्थिति में किये जाने वाले कार्य का झूठा सत्यापन दिखा कर अगली किश्तें तो हाथ में आती हैं पर निर्मम व्यवस्था लगभग पूरा धन निगल जाती है। फाइल पर सप्रमाण बावड़ी बन जाती है, वास्तविकता में सब सपाट।

अरमान अली का अरमान

यहाँ तक की कहानी तो देश में नित जी रहे हैं देशवासी। कहानी में घुमावदार लोच इसके बाद आता है।

फाइल पर सत्यापित बावड़ी के आधार पर पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखवायी जाती है कि बावड़ी चोरी चली गयी है। सब दंग। सूचना के अधिकार के आधार पर इस प्रकार खोयी 75 अन्य बावड़ियों की सूचना मिलती है। पहले थाने, फिर कलेक्ट्रेट और अन्ततः आंदोलितजन मंत्रीजी से मिलते हैं। अरमान अली के सभी प्रयासों में उनकी बिटिया मुस्कान उनका प्रोत्साहन करती रहती है। वेल डन अब्बा। मीडिया को नयी ब्रेकिंग न्यूज़ मिल जाती है और बावड़ी खोने का समाचार दावानलीय गति से चहुँ ओर फैल जाता है। चुनावी प्राथमिकताओं और विपक्ष के ताण्डव के बाद अगले तीन दिन में बावड़ियों को ढूँढ़ के लाने का शासनादेश प्राप्त होता है। स्थानीय प्रशासन में जिन्नात्मक चेतना जागती है और तीन दिनों में सारी बावड़ियाँ वापस आ जाती हैं (बना दी जाती हैं)।

इस पूरे प्रकरण में मुस्कान को आरिफ नाम का नेक लड़का मिल जाता है जो मानवता के नाते भी सहायता करता है। बावड़ी बन जाती है, विवाह हो जाता है पर दो महीने अधिक लग जाते हैं वापस जाने में।

बोमन ईरानी का अभिनय, दख्खिनी हिन्दी के संवाद और कथानक की जीवन्तता पूरी फिल्म में मन लगाये रखते हैं। पारिस्थितिक हास्य परिपूर्ण है और रह रह कर हँसना होता रहता है पूरी फिल्म में। सामाजिक संदेश उतना ही गंभीर है मगर।

आप भी देख लीजिये। पता नहीं कितनी कमर-मटकाऊ फिल्मों में समय झोंक चुके हैं, कुछ सार्थक भी हो जाये। आपके भी बच्चागण बोलें वेल डन अब्बा
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