दिन और जीवन

by प्रवीण पाण्डेय

दिन दिन से बनता जीवन

मुझे एक दिन में एक जीवन का प्रतिरूप दिखता है। प्रातः उठने को यदि जन्म माने और रात्रि सोने को मृत्यु तो पूर्वाह्न, अपराह्न और सायं क्रमशः बचपन, यौवन व वृद्धावस्था के रूप में प्रकट हो जाते हैं। इस समानता का दार्शनिक अर्थ निकाला जा सकता है, इसे वैज्ञानिकता से सुस्पष्ट करना रोचक हो सकता है पर इसका कोई व्यवहारिक संदेश भी है, यह प्रश्न कभी कभी चिन्तन को कुरेदने लगता है।

दिन और जीवन दो काल खण्ड हो सकते हैं पर अन्तर्निहित समानता उनके संबन्धों को उजागर कर जाती है। सृष्टिकर्ता के पास सम्भवतः समय के विषय में और ढाँचे उपलब्ध न हों। शास्त्रों में तो मृत्यु को भी अगले जन्म के पहले की नींद ही कहा गया है।
 
दार्शनिक पक्ष ऊबाऊ हो सकता है, आइये व्यवहारिकता देखते हैं।

एक दिनचर्या जीवन का निर्माण कैसे करती है और उसी प्रकार जीवन के विशिष्ट कार्य हमारे दिनों के कैसे गढ़ते हैं, समानता के सम्बन्ध का यह पहला व्यवहारिक प्रश्न होगा।

एक बार आराधना जी ने नियमितता और निरन्तरता के छत्ते को छेड़ा था। मैने पहले कुछ समझाने का प्रयास किया पर स्वयं संतुष्ट न होने पर समझने की गली में मुड़ गया।

डाo आराधना उवाच
रौ में मैं उवाच
नियमितता निरन्तरता का व्यवहारिक रूपान्तरण है। कई अर्थों में जब हम दिन को जीवन का प्रतिरूप बना जीने लगते हैं तो वही नियमितता हमारी निरन्तरता का प्रतीक बन जाती है। निरन्तरता उससे कहीं व्यापक मानता हूँ मैं। लक्ष्य निर्धारित करके उन्हे पाना और उसी दिशा में और ऊँचे लक्ष्यों का निर्धारण निरन्तरता का द्योतक है। बड़े कालखण्डो पर विजय की ध्वजा निरन्तरता ने फैलायी है।………

अब ज्ञान झोंककर निकल जाना कठिन नहीं है पर उससे मन हटाकर रह पाना कठिन हो जाता है। विचार लखेदे रहा और निष्कर्ष रूप में यह पोस्ट जन्म ले रही है।

ग्रेसाम के योजना के नियम की मानें तो यदि नियमित कार्यों पर अधिक ध्यान दिया जायेगा तो जीवन के विशिष्ट कार्य पीछे छूट जायेंगे। या दूसरे शब्दों में कहें तो सूक्ष्मदर्शिता दूरदर्शिता को उभरने नहीं देती है।
उसी प्रकार यह भी सत्य है कि जीवन के विशिष्ट कार्य एक दिन में नहीं किये जा सकते।

अब कौन ठीक है, ग्रेसाम जी, डा आराधना या अन्जाने में मैं?

आपके मन में भी यह प्रश्न तो उठता होगा।

आपके विचार कोई राह अवश्य ही ढूढ़ लेंगे इस समस्या की पर मुझे तीनों में कोई विरोधाभास नहीं दिखता है, यदि निर्णय इस प्रकार लिया जाये।

दिन जीवन का प्रतिरूप है अतः जीवन के विशिष्ट कार्यों का दिनचर्या में उपस्थित रहना आवश्यक है। यह नियमितता होगी हमारे जीवन के उद्देश्यों की। बड़े कार्यों में कई कार्यश्रंखलाओं का समावेश होता है अतः वह क्रम हमारी निरन्तरता निर्धारित करेगा। यदि हमें जीवन में पाने योग्य वस्तु पर दैनिक या साप्ताहिक ध्यान नहीं जाता है तो आप मान कर चलिये कि वह आपकी पकड़ के बाहर जा चुकी है। इन कार्यों का पहला अधिकार दिन के समय में, शेष कार्य आगे पीछे अपना स्थान ढूढ़ ही लेते हैं दिन में। अपने जीवन को दिन में जीने का प्रयत्न करें, दिन से जीवन का निर्माण सब करते हैं।

आपके 5 प्रमुख उद्देश्य क्या हैं? वो आज किये हैं? तब! अच्छा अभी नहीं पर आज अवश्य कर लीजियेगा।
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