खिलौनों की वेदना – Toy Story 3

by प्रवीण पाण्डेय


एक मैं, एक आप

खिलौने बतिया रहे हैं कि अब उन्हें उतना प्यार नहीं मिलता है जितना पहले मिलता था। बच्चा महोदय अब बड़े हो गये हैं और उनकी प्राथमिकतायें बदल गयी हैं। चलो भाग चलते हैं। कहाँ? किसी ऐसे स्थान पर जहाँ पर ढेर सारे बच्चे हों । कहाँ? डे केयर सेन्टर। विरोध के स्वर दबा दिये जाते हैं और सब किसी तरह वहाँ पहुँच जाते हैं। बुरे बर्ताव से मोह भंग होता है और सब वापस आ जाते हैं। बच्चा महोदय भी भावुक हो एक नन्ही प्यारी बिटिया को सारे खिलौने दे जाते हैं। सुखान्त।

बच्चे मल्टीप्लेक्स के बाहर निकले तो प्रसन्न थे। उन्हें अपने खिलौनों की वेदना फिल्म देखकर ही समझ में आयी। लोहा गरम था तो हमने भी पुराने खिलौनों को किसी गरीब बच्चे को दिलवाने की बात मनवा ली। 3-D में फिल्म का आनन्द दूना हो गया था और रही सही कसर पॉपकार्न आदि स्नैक्स ने पूरी कर दी थी। स्टीव जाब्स निर्मित पिक्सार की तकनीक ने कार्टून चरित्रों को भावजनित जीवन्तता दे दी थी।

खिलौने तो मानवीय ढंग से बतियाये और मनोरंजन कर के चले गये पर अपनी खिलौनीय वेदना का मानवीय पक्ष हमारे हृदय में उड़ेल गये। छोटी छोटी बातों में हिल जाने की और बड़ी घटनाओं में अजगरवत पड़े रहने की हमारी विधा से लोग त्रस्त हों, उसके पहले हम सब ब्लॉग में उड़ेल कर सामान्य हो लेते हैं।

खिलौने क्यों, हम सबकी यही स्थिति है। भाव वही हैं, सन्दर्भ बदल जाते हैं। जिन्हें हम अपना समझने लगते हैं, वही हमारा मूल्य नहीं जानते। जिन पर प्यार की आशायें पल्लवित थीं, उनकी प्राथमिकतायें बदल गयी हैं।

और गहरे उतरें इस वेदना में। दिन में कितनी बार आप को लगता है कि जो आपकी योग्यता है और जो आप कर सकने में सक्षम हैं, उसका एक चौथाई भी आप नहीं कर पा रहे हैं। इतने कम में ही संतुष्ट हो जाना पड़ रहा है, हर बार, लगातार, कारण ज्ञात नहीं पर।

मैं खिलौना बन जाता हूँ और देखता हूँ कि शेष सब सिकुड़ कर बच्चा महोदय बन गये हैं। कभी सब के सब चाहते थे आपको, आपकी उपयोगिता थी। सब छोड़ देने को जी चाहता है, दूसरा विश्व अच्छा दिखने लगता है, डे केयर सेन्टर की भाँति। नयापन, अपने स्वभाव से अलग, बस नया सब कुछ। जीवन सब कुछ बदल लेने का हठ पकड़ लेता है, जो भी मिले।

क्या, मैं विद्रोही या तुम सब प्रेमहीन?

बदलाव भाता नहीं है पर। नये लोग भी मर्म नहीं समझते हैं। उनकी आशायें आपको निचोड़ने लगती हैं, जीवन रस से।

आप भागते हो, प्रश्न पूछते हो अपने मालिक से, असली मालिक, ईश्वर से। कोई उत्तर नहीं।

अन्ततः स्वयं को समझाने की समझ अवतरित हो जाती है, ज्ञानीजन जिसे बुद्धि कहते हैं।

हम सोफे के हत्थों पर टाँग धरकर लेटे हुये सोच रहे हैं, खिलौनीय वेदना। सब चाहते हैं हम बतियायें फिल्म के बारे में। लेटे हुये नींद घेर लेती है। अवचेतन में लहरें अभी भी प्रश्न के हिलोर लेती हैं ।

क्यों हृदय में आस जीवित? 
प्रेम का विश्वास जीवित?

हर समय ये नेत्र रह रह ढूढ़ते जिनको।
इस जगत को वेदना उपहार देकर,
काल को सब निर्दयी अधिकार देकर,
क्षीर सागर में कहीं विश्रामरत हैं वो।
क्षीर सागर में अभी विश्रामरत हैं वो।
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