28 घंटे

by प्रवीण पाण्डेय

मैं ट्रेन में चढ़ा, तुमने मुड़कर पीछे न देखा । एक आस थी कि तुम एक बार मुड़कर देख लेती तो 28 घंटे की यात्रा 28 घंटे की न लगती ।

सामान कम लेकर चलता हूँ, उतना कि जितना स्वयं उठा सकूँ । यात्रा के हर सामान पर दो बार सोचने का टैग लगाता हूँ । सामान को अधिक महत्व देता हूँ क्योंकि उठाता स्वयं हूँ । विचारों को महत्व देता हूँ क्योंकि उनका बहकना स्वयं को झेलना पड़ता है । यादें अधिक नहीं सहेजना चाहता हूँ, बहाकर ले जाती हैं भावनाओं के ज्वार में । पैसा कम खर्च करता हूँ, बचाता हूँ भविष्य के लिये, महत्वपूर्ण है । सब कम कर रखा है, सबको महत्व दे रखा है स्वयं से अधिक ।

तुम्हारे एक बार मुड़कर देख लेने को भी अपने 28 घंटों से अधिक महत्व दे रखा है । ये 28 घंटे मेरे जीवन से खो गये तुम्हारे एक बार मुड़ कर न देखने से ।

रात के दो बजे थे, तुम्हारी आँखों में नींद होगी । मैं फिर भी चाहता था कि तुम एक बार देख लेती । हो सकता है जब तुमने मुड़कर देखा हो मैं सामान लेकर चढ़ रहा था या यह मानकर अन्दर चला गया कि अब तुम नहीं देखोगी ।  पर तुम्हारी आँखें मेरी ओर उस समय क्यों नहीं घूमी जब मैं चाह रहा था । तुम्हारी ओर देखते हुये तुम्हारे कन्धों को मोड़ना चाह रहा था अपनी ओर । लगता है, मेरी आँखों में अब वह बल नहीं रहा जो खींच ले तुम्हारी दृष्टि, अचानक, बलात, साधिकार ।
मुझे व्यग्रता है कि तुम्हारी आँखों ने मेरी आँखों की अवहेलना कर दी ।

मेरा प्रेम रोगग्रसित है । पहले तो अवहेलना व अधिकार जैसे शब्द नहीं आते थे हमारे बीच । पर पहले तो तुम्हारी आँखें हमेशा मेरी ओर ही मुड़कर देखती थी और मेरी यात्राओं को यथासम्भव छोटा कर देती थी । आज तुमने अपनी यात्रा छोटी कर ली है । तुम्हे मंजिल पाने की शीघ्रता है । तुम्हारा निर्णय था हवाई यात्रा का । तुम हवाई जहाज की तरह उड़ान भरना चाहती हो, मैं ट्रेन की दो पटरियों के बीच दौड़ता, लगातार, स्टेशन दर स्टेशन । मेरे टिकट पर एक और सीट तुम्हारी राह देखती रही पूरे 28 घंटे ।
 
उत्तरोन्मुख मानसून को चीरती ट्रेन दक्षिण दिशा को भाग रही है । बूँदों के छोटे छोटे तमाचे सहती अपनी गति से बढ़ी जा रही है मेरी ट्रेन । पटरी और बूँदों से ट्रेन के संघर्ष का कोलाहल संभवतः मेरी जीवनी से मिलते जुलते स्वर हैं । तुम्हारा जहाज तो इस मानसून से परे, पवन की गोद में उड़ा जा रहा होगा ।
   
खिड़की पर बूदें उमड़ती हैं, लुप्त हो जाती हैं, विंध्य पर्वत के हरे जंगल पीछे छूट रहे हैं, यात्री उत्साह में बतिया रहे हैं, बगल के केबिन में एक युगल बैठा है । तुम रहती तो दिखाता । तुम नहीं हो पर तुम्हारा मुड़कर न देखना सारे दृश्य रोक कर खड़ा है, हर क्षण इन 28 घंटों में ।

बहुत परिचित आये थे स्टेशनों पर मिलने, पूछते थे तुम्हारे बारे में । क्या बताता उन्हें, तुमने तो मुड़कर भी नहीं देखा ।

समझाना चाहता हूँ मन को, विषय भी हैं बहुत जो ध्यान दिये जाने की राह तक रहे हैं पर तुमने मुड़कर क्यों नहीं देखा ?

सोचा कि पूछ लूँ मोबाइल से पर हमारे नेटवर्क तुम्हारे जहाज की ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाते हैं ।

तुम पहले पहुँच गयी होगी । आशा है तुम्हारी आँखें मेरी बाट जोहती होगीं । 28 घंटे जो प्रश्न उमड़ते रहे, संभवतः अपने उत्तर पा सकेंगे । संभवतः मुझे मेरे 28 घंटे वापस मिल जायेंगे ।
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