मैं तुम्हे मरने नहीं दूँगा

by प्रवीण पाण्डेय

“कैंसर ठीक, बीपी ठीक, डायबिटीज़ ठीक, मोटापा ठीक, ऑर्थिराइटिस ठीक, हेपेटाइटिस ठीक…………. लाइफ स्टाइल डिसीज़ेज़ ठीक….। मैं आपके क्षयमान अंगों को पुनः ऊर्जान्वित कर दूँगा । तुम बताओ अब मरोगे कैसे ? योग कर लो ना, देखो, मैं तुम्हे मरने नहीं दूँगा ।”
सपने में नहीं सुन रहा था पर सपने देखने के समय सुन रहा था ।
समय सुबह के 5 बजे, स्थान पैलेस ग्राउण्ड, मौसम मन्द मन्द शीतल बयार, 20000 श्रोता और उद्घोषणा बाबा रामदेव की ।
रात के अँधेरे में जीवन का उदय

सुबह 4 बजे बलात् उठाये जाने के बाद, आँखों में नींद अभी भी तैर रही थी । ध्यान की मुद्रा में बैठ नींद झाँपने का असफल प्रयास कर रहा था । कान में गर्जना के स्वर में ये वाक्य सुनायी पड़े । नींद उड़न छू, कपालभाती चालू ।

पुरुष चाहे सारा संसार साध ले पर स्वयं के योगक्षेम का अधिकार यदि श्रीमतीजी से हथियाने का प्रयास भी किया तो कई दिन दुर्गास्तुति में निकालने पड़ सकते हैं । शरीर और मन को विद्रोह न करने की मन्त्रणा देकर, चुपचाप सपत्नीक योग शिविर में पहुँच गये ।

धीरे धीरे परिस्थितियों में रमना प्रारम्भ किया । सामूहिकता का अपना अलग आनन्द है । घर में यदा कदा सुबह उठने पर लगता है कि अभी तो सब सो रहे होंगे और आप ही अनोखे हैं जो कि जग कर आत्मोन्नति में लगे हैं । यहाँ अपार जनसमूह में अनोखेपन का तत्व कहाँ छिप गया, पता नहीं चला ।

सामूहिकता का आनन्द

अब अपना शरीर किसको प्यारा नहीं होता है । मृतप्राय को जीवन, जीवित को निरोग, निरोगी को स्वास्थ्य, स्वस्थ को सुडौलता, सुडौल को कान्ति, कान्तिमय को शान्ति और शान्तिमय को स्थितिप्रज्ञता दे जाता है योग । अतः योग तो हम सबके लिये हुआ, किसी भी आयु में, किसी भी देश में । इसके प्रचार के लिये तो झूठे विज्ञापनों की आवश्यकता भी नहीं ।

वैसे तो घंटे भर की प्रशासनिक बैठक में चार बार जम्हाई आ जाती है, यहाँ पर ढाई घंटे तक तन्मयता बनी रही । योग के साथ स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान, संस्कृति के आयाम, सामाजिक समरसता के भाव, पारिवारिक माधुर्य के उपाय आदि बड़ी ही सरलता व सहजता से हृदय के अन्दर उतार गये बाबाजी । ढाई घंटे का कार्यक्रम, चार दिन लगातार, न पता चला और न ही दोपहर में नीँद ही आयी । दिनभर एक नशा सा रहा हल्केपन का, शरीर में, मन में, आत्मा में ।
योग का वाहन

निरन्तरता से आप कुछ भी पा सकते हैं, कुछ भी । जो विचार आपको भायें, बाँटे अवश्य, संकोच में न रहें । जो भी करें, पूर्ण बल से करें, सिंह की तरह । इस तरह के कई वाक्य सीधे सीधे मन में अनुनादित हो रहे थे, बौद्धिक चुहुलबाजी से बहुत दूर ।

कोई अहंकार नहीं, बाल सुलभ संवाद, प्रसन्नता और आनन्द का प्रवाह मेरी ओर आता हुआ, बीच में और कोई नहीं ।
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